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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

Political View
 
Article Title:  वर्तमान परिदृश्य में समाजवाद : चुनौतियाँ और संभावनायें

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Article Content:  समाजवाद का प्रथम चरण पूर्ण हो चुका है और अगले चरण की औपचारिक शुरुआत होनी शेष है। प्रथम चरण की मान्यतायें और सिद्धान्त को आजकल की युवा पीढ़ी गम्भीरता से नहीं ले रही है जिसकी वजह से समाजवादी आन्दोलन कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। पिछड़े वर्ग एवं दलित वर्ग की जातियों में आपस में ही अपनी-अपनी प्रभावी जातियों के विरूद्ध असंतोष बढ़ा है जो अन्तवर्कलह का रूप ले चुका है। यह समाजवादी आन्दोलन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहीं है। प्रथम चरण में कुछ ही पिछड़ी जातियाँ और कुछ ही दलित जातियाँ एक मुकाम हासिल करने में सफल हुईं जिससे अन्य पिछड़ी और अन्य दलित जातियाँ कुण्ठाग्रसित होकर आत्मघाती निर्णय ले रही हैं। वैसे प्रथम चरण काफी सार्थक रहा और ढेर सारे मिथक, जो समाज में स्थापित थे, वे टूटकर चकनाचूर हो गये। इस चरण ने जनमानस के दिमाग से साफ कर दिया कि बुद्धिमता, योग्यता, कार्यकुशलता किसी जाति, वर्ग या धर्म विशेष की जागीर नहीं है और हर जाति या वर्ग में यह समान रूप से विद्यमान हैं। पिछड़े और दलित समाज के लोगों ने प्रशासनिक क्षेत्र में कई नये मापदण्ड स्थापित कर यह सिद्ध कर दिया कि देश की सत्ता संभालने में वे अन्य लोगों से ज्यादा सिद्धहस्त हैं। वंचित समाज ने शिक्षा की शक्ति एवं समूह की उपयोगिता का भी महत्व सीख लिया। संविधान के महत्व और उसकी जानकारी के अलावा लोग अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति भी जागरूक हुए, परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन साफ-साफ दृष्टिगत होने लगा। समाजवाद का मूलमंत्र समाज में स्थापित आम और खास के अन्तर को पाटकर एक ऐसा समाज स्थापित करना है जिसमें लोग आपस में प्रत्येक व्यक्ति एवं समूह के हक (अधिकार) को मान्यता दें। यदि लोग आपस में एक-दूसरे के हक को स्वीकार नहीं करते तो समाजवाद की जमीन तैयार होना मुश्किल है। जबतक समाज में आम और खास की मानसिक वृत्ति समाप्त नहीं होती और लोग एक-दूसरे के अधिकारों के प्रति संजीदा नहीं होते, समाजवाद की राह मुश्किल ही रहेगी। समाज के लोग जब तक खास व्यक्ति होने की मानसिक अवस्था से आजाद होकर हक के आधार पर संसाधनों के बँटवारे के लिये मानसिक रूप से तैयार नहीं हो जाते, समाजवाद की पृष्ठभूमि तैयार नहीं हो सकती। आम और खास की अवधारणा से बाहर निकल कर अधिकार और कर्तव्य की मान्यता स्थापित होना ही समाजवाद की चरम परिणति है। वर्तमान समय में आम और खास की खाई को पाटने का सर्वोत्तम उपाय तकनीकी का समावेश है। तकनीकी समावेश बहुत आसानी से आम और खास की खाई पाटकर हक के आधार पर संसाधनों का पारदर्शी तरीके से बँटवारा कर देता है जिससे वैमनस्यता खत्म होती है और नागरिक हक का मतलब महसूस करने लगते हैं। उन्हें खास होते हुए भी किसी चीज को न प्राप्त करने का मलाल नहीं होता और धीरे-धीरे वे संसाधनों का हक के आधार पर बँटवारे को स्वीकार कर लेते हैं। भारत में पिछले एक दशक से सामाजिक संक्रमण काल का चक्र चल रहा है। उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार इस संक्रमण काल के चरम दौर में थी। बेशक उन्होंने मनमोहन जी की केन्द्रीय सरकार की तरह ही तकनीकी समावेश भरपूर किया परन्तु दलितों और अन्य पिछड़ों को वे विश्वास दिलाने में नाकाम रहे कि वे तकनीकी समावेश से आम और खास के अन्तर को मिटाकर हक और हुकूक के आधार पर संसाधनों का बँटवारा करने का मार्ग प्रशस्त करने का काम कर रहे हैं। जिला पंचायतों के अध्यक्षों की सूची, पुलिस भर्ती, ब्लॉक प्रमुखों की सूची, निगमों के अध्यक्षों की सूची और अन्य सरकार द्वारा चयनित की जाने वाली रिक्तियों और पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों ने उनकी सारी विस्तृत खुली सोच और किये गए सारे ऐतिहासिक कार्यों को हजम कर लिया। जिस तरह मनमोहन सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धियों को भ्रष्टाचार खा गया। अखिलेश जी, मनमोहन जी और मायावती जी जैसे सख्तल प्रशासन देने में भी नाकाम रहे जिसकी वजह से कमजोर तबके में हमेशा भय का समावेश रहा। जब तक सख्ते प्रशासन और विकास साथ-साथ लागू नहीं होगा, तब तक भ्रष्टाजचार पर अंकुश नहीं लगेगा और कमजोर लोगों का आत्मलविश्वाास नहीं बढ़ेगा। निःसंदेह ये तीनों नेता विस्तृत सोच के हैं और समाजवाद स्थापित करने का इनके पास व्यापक दृष्टिकोण है परन्तु वर्तमान समय में ये मात खा चुके हैं। आज रेलेव रिजर्वेशन प्रणाली, 108 एम्बुलेन्स सेवा, 100 पुलिस सेवा, खसरा खतौनी वितरण सेवा, महिलाओं की सुरक्षा हेतु 107 पुलिस सेवा, सख्‍त प्रशासन इत्यादि समाज से आम और खास के अन्तर को पाट कर एक विशुद्ध समाजवादी सोच को धरातल पर उतारने का काम कर रही हैं और ऐसा इन क्षेत्रों में तकनीकी समावेश से ही संभव हुआ है। अत: वर्तमान समय की माँग तकनीकी समावेश के साथ-साथ सख्ते प्रशासन की भी है। अत: समाज को अखिलेश और मायावती का अलग-अलग रूप नहीं बल्कि मिश्रित रूप की जरूरत है। वर्तमान परिवेश में सभी दलों के समक्ष यह चुनौती खड़ी हो गयी है कि वे अपने मूल जातीय वोटरों के साथ-साथ अन्य जातियों में अपनी विश्वसनीयता कैसे कायम रखें। लगभग सभी दलों का आधार वोट कोई न कोई जाति है, ऐसे में यह निर्णय और भी कठिन हो जाता है। पिछड़ों की राजनीति करने वाले दलों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि उस दल के सबसे प्रभावी जाति के लोग यदि आरक्षण का लाभ सबसे अधिक ले रहे हों तो अन्य पिछड़ी जातियों को कैसे संतुष्ट किया जाय। यदि वे प्रभावी जाति पर अंकुश लगाते हैं तो कहीं प्रभावी जाति ही बगावत न कर दें। यही समस्या दलितों की राजनीति करने वाले दलों के साथ भी है। सवर्णों की राजनीति करने वाले दल इन समस्याओं से जरूर अछूते हैं परन्तु प्रभावी जाति का ज्यादा लाभान्वित होना उनके लिए भी एक समस्या के रूप में सामने खड़ा हो जाता है। दूसरी अहम चुनौती पिछड़ों, दलितों और अल्प्संख्येकों में आपस की टूटी हुई विश्वजसनीयता को पुनर्जीवित करने की है। नब्बे के दशक में जब दलित, पिछड़े और अल्प संख्यहक एक मंच पर आये थे, उस समय पिछड़ों की नासमझी ने इसे ऐसा तोड़ दिया जो आजतक जुट नहीं पाया है। दरअसल दलित और अल्पेसंख्य कों की यह सोच थी कि अपेक्षाकृत मजबूत पिछड़े वर्ग के लोग बड़े लोगों के अत्यांचार से उन्हेंस मुक्ति दिलायेंगे और उनके अगुआ के रूप में उनसे लड़ेंगे, परन्तुत हुआ ठीक इसके उल्टाच और पिछड़े वर्ग के लोग भी दलितों और अल्पेसंख्यगकों को शोषण करने लगे। जहाँ उन्हेंे शोषित वर्ग से लड़ने के लिये अगुआ बनाया गया था, वे खुद ही शोषण करने लगे। सवर्णों की अल्प संख्या सत्ता तक पहुँचाने के लिए काफी नहीं है, अतः उनकी कहीं-न-कहीं से निर्भरता अपने-अपने दलों से नाराज पिछड़ों और दलितों पर टिकी रहती है। इसके अतिरिक्त भारतीय समाज में दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के मीडिया, उद्योग, व्यापार के क्षेत्र में अनुपस्थिति भी पिछड़े और दलित दलों को योजनाबद्ध तरीके से अपने मतदाताओं को संतुष्ट करने का कोई मार्ग नहीं छोड़ती। वर्तमान चुनौतियों से पार पाने के लिए दलित और पिछड़ों की राजनीति करने वाले व्यक्तियों को दृढ़ आत्मविश्वास और स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ कार्य को अंजाम देने की जरूरत होगी। दलित अल्पसंख्यक और पिछड़ों की राजनीति करने वाले व्यक्तियों को तुरन्त आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धान्त को लागू करने की वकालत शुरू करनी पड़ेगी, जिससे अन्य पिछड़ों और अन्य दलितों का विश्वास जीता जा सके और उनमें आत्मविश्वास की जागृति हो सके। उन्हें कुछ पाने की उम्मीद पैदा हो सके, अन्यथा वे पिछड़े या दलित झण्डों के नीचे फिर लौटेंगे ही, इसकी उम्मीद नहीं दिख रही। मामला मात्र यह नहीं है कि वे दूसरे दलों को सत्ता में भेजकर कुछ हासिल कर पा रहे हैं परन्तु अब उन्हें प्रभावी पिछड़ी और दलित जातियों के हासिये पर जाने से संतुष्टि प्राप्त हो रही है। वे खुश हो रहे हैं कि चलो अब प्रभावी जातियाँ भी हासिये पर आ रही हैं। ऐसे में सभी के लिये यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि क्रीमी लेयर के सिद्धान्त को आधार बनाकर उनके खोये हुए विश्वास को जीता जाय और समाजवाद को मुख्यधारा में वापस लाया जाय। समस्या यह है कि क्या क्रीमी लेयर के नाम पर मूल वोटर नाराज होकर बगावत कर देगा? संभव है, परन्तु यदि उनको इससे होने वाले लाभ के प्रति समझाया जाय तो मेरे विचार से वे नाराज होने के बजाय खुश होंगे। वर्तमान में आरक्षित वर्ग का नौकरी पाया व्यक्ति यही सोचता है कि उसकी अगली पीढ़ी को भी नौकरी ही मिले। वह व्यवसाय, उद्योग के बारे में नहीं सोचता और ना ही सामान्य वर्ग से सीट हासिल करने के बारे में सोचता है। यदि क्रीमी लेयर का सिद्धान्त लागू होगा तो आरक्षण प्राप्त व्यक्ति शुरु से ही अपने बच्चे के लिये उसकी योग्यतानुसार काम के बारे में सोचना शुरु कर देगा और जब शुरु से ही योजना पर काम करेगा तो वह सफल भी होगा। यदि उसका बच्चा पढ़ने में अच्छा है तो उसे अच्छी से अच्छी शिक्षा देकर प्रतियोगी परीक्षा के लिए तैयार करेगा, नहीं तो किसी उद्योग लगाने या व्यवसाय कराने के बारे में सोचेगा। परन्तु आज आरक्षण की वजह से उसकी सोच सीमित हो गयी है और वह अपने बच्चे के लिए नौकरी के अलावा कुछ सोचता ही नहीं जिसकी वजह से पिछड़े और दलित समाज में विघटन की स्थिति उत्पन्न हो रही है। दलितों और अल्पजसंख्य कों के मन में समाये पिछड़ों द्वारा शोषण के भय को भी निकालने की जरूरत होगी और पिछड़े वर्ग के लोगों को यह विश्वादस पैदा करना होगा कि वर्तमान परिस्थिति में वे दलित-अल्पकसंख्य कों के शोषण की बजाय, शोषक वर्ग से संघर्ष में उनके अगुआ का रोल अदा करेंगे। समाजवादी विचारकों को इस बात पर गम्भीणर चिन्त न करना पड़ेगा कि किस तरह दलितों और अल्पोसंख्य कों को पिछड़ों के शोषण के भय से मुक्त् करायें और पिछड़ों को यह समझना होगा कि उनका कार्य शोषक और शोषक वर्ग के शागिर्द की भूमिका अदा करनी नहीं है। समाजवादी विचारकों को पिछड़े, दलित और अल्पकसंख्य्कों के हितों को अलग-अलग रखने की जरूरत होगी जिससे इनमें आपस में हितों की टकराहट ना हो। यह देवरानियों और जेठानी के झगड़ों को सुलझाने जैसा है, अत: विचारकों को इन तीनों बहुओं के हितों को इस तरह अलग-अलग रखना होगा जिससे ये आपस में भिड़ने न पाये। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक होशियार घर का मालिक तीनों बहुओं को अलग-अलग रखकर परिवार की एकता और सौहार्द बनाये रखता है। जब पिछड़े और दलित उद्योग और व्यापार में कदम बढ़ाने लगेंगे, तब वास्तविक सामाजिक परिवर्तन का दौर दृष्टिगोचर होगा। जब पर्याप्त मात्रा में उद्योग जगत में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी हो जायेगी तब दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग की मीडिया क्षेत्र में स्वकत: ही भागीदारी होने लगेगी क्यों कि उद्योग जगत ही मीडिया जगत का आधार उत्पन्न करता है। समाजवाद के दूसरे चरण की उपलब्धि यही होगी कि भारतीय दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक सामाजिक, राजनैतिक क्षेत्र की भाँति उद्योग क्षेत्र में प्रभावी भूमिका अदा कर आर्थिक समानता का मार्ग प्रशस्त करें और यह आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धान्त को लागू किये बगैर असंभव है। संविधान में आरक्षण का प्रावधान भागीदारी के सिद्धान्त को पूर्ण करने हेतु किया गया है। अतः समाजवादी विचारधारा के व्यक्तियों और दलों को मजबूती एवं दृढ़ इच्छाशक्ति से प्रमोशन में आरक्षण की पुरजोर वकालत करनी चाहिए और इसके लिए संघर्ष जारी रखना चाहिये। यह दलित, पिछड़े सबके लिए उपयुक्त, संविधान के अनुरूप और हर पद पर भागीदारी सुनिश्चित करने का सार्थक हथियार है। समाजवादी विचारकों को योग्यता के झाँसे में आकर आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत नहीं करना चाहिए क्योंकि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं, हर पद और संसाधन पर हर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित करने का सिद्धान्त है।
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Posted On:  21/Apr/2017
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
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Article Title:  लोकतांत्रिक राजशाही का देश- भारत

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Article Content:  लोकतंत्र में जनता गणों का (सांसदों/विधायकों) का चुनाव करती है, जिसका आधार एक विचारधारा पर केन्द्रित होता है। अर्थात जनता द्वारा विचारधारा के पक्ष अथवा विपक्ष में मताधिकार का प्रयोग किया जाता है। जबकि राजतंत्र में व्यक्ति को राजपरिवार द्वारा नियुक्त किया जाता है। इसमें व्यक्ति की महत्ता होती है विचारधारा प्रायः गौण हो जाती है। दुनिया के विकसित देशों में लोकतंत्र का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है जैसे ब्रिटेन, रूस, फ्राँस, जापान, अमेरिका, चीन जबकि पिछड़े देशों में अभी भी किसी न किसी रूप में राजशाही अस्तित्व में है। विकासशील देशों में एक नये तंत्र का उदय हुआ है जिसको हम लोकतांत्रिक राजशाही कह सकते हैं। इस तंत्र में लोकतांत्रिक तरीके से व्यक्ति का चुनाव प्रचलन में हैं, विचारधारा गौण है। इस श्रेणी में भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, इरान, इराक, इजराइल इत्यादि देश आ रहे हैं। उपर्युक्त स्थितियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि लोकतंत्र की मजबूती विकास की आधारभूत संरचना तैयार करती है। भारतीय परिदृष्य यह स्पष्ट करता है कि यहाँ पर लोकतांत्रिक राजशाही का जबरदस्त प्रभाव है। दल तो हैं पर वे किसी विचारधारा पर आधारित न होकर व्यक्ति पर आधारित हैं। मतदान द्वारा चुनाव की आजादी तो है परन्तु मत विचारधारा को नहीं व्यक्ति को दिये जाते हैं। मतदाताओं के इसी स्वभाव नें शायद दलों में विचारधारा के प्रभाव एवं आवश्यकता को ही समाप्त कर दिया है। यहाँ गणों (सांसदों/विधायकों) द्वारा नेता नहीं चुने जाते बल्कि नेता के नाम एवं प्रभाव की वजह से जनता द्वारा सांसद एवं विधायक चुने जाते हैं। भारतीय जनता सीधे प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री चुनती है इस प्रक्रिया में कोई भी सांसद या विधायक बन जाता है। उसकी योग्यता, स्वभाव, कार्यव्यवहार का कोई औचित्य नहीं होता। भारतीय जनता सीधे अपना राजा चुनती है न कि विचारधारा इस प्रक्रिया में भले ही कोई असामाजिक तत्व ही क्यों न सांसद या विधायक चुन लिया जाय। वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य में प्रधानमंत्री पद हेतु भारतीय जनता की सोच राहुल गाँधी, नरेन्द्र मोदी, लालकृश्ण अडवानी, सोनिया गाँधी तक ही सीमित है, यहाँ तक कि राज्यस्तर पर भी जनता के मुख्यमंत्रियों की सूची भी सार्वजनिक है जैसे उतर प्रदेश में मायवती, मुलायम सिंह यादव, कलराज मिश्र, कल्याण सिंह, रीता बहुगुणा, बिहार में नीतीश कुमार, लालू यादव, सुशील मोदी या रामविलास पासवान, मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह, ज्योति रादित्य, उमा भारती या शिवराज सिंह चैहान, राजस्थान में वसुन्धरा राजे या अशोक गहलोत, पंजाब में प्रकाश सिंह, अमरेन्द्र सिंह, हरियाणा में देवीलाल, भजनलाल , तमिलनाडु में जयललिता या करूणानिधि, आन्ध्रप्रदेश में चन्द्र बाबू नायडू, वंगारू दत्तात्रेय, वाइ० एस० परिवार, जगमोहन रेडडी, रधुवीर रेडडी, कर्नाटक में वंगारथा या एस० सुरेश कुमार, या देवगौड़ा परिवार, विनय कुमार सोराके इत्यादि। लगभग पूरे देश में कमोवेश यही स्थिति है। हर राज्य की जनता के अपने-अपने पसंद के नेता हैं जिनका राज्याभिषेक वह प्रत्येक पाँचवे वर्ष करनें का प्रयास करती है। विचारधारा दूर-दूर तक जनता की सोच में नहीं है। इतना ही नहीं भारतीय जनता अपने राजा के मरणोपरान्त उनके पुत्रों/पुत्रियों में से उत्तराधिकारी का भी चुनाव कर लेती है और आगे उसका चुनाव करने लगती है। ऐसा लगता है भारतीय जनता अपने-आप को राज परिवार का सदस्य समझती है और वह मतदान का प्रयोग चुनाव हेतु नहीं बल्कि राज्याभिषेक हेतु करती है। कहीं-कहीं विचारधारा का भी प्रभाव दिखता है मगर वो भी व्यक्तिवाद से अछूता नहीं है। विचारधारा में ही व्यक्तिवाद की प्रधानता है। भारतीय परिवेश में समाजवाद, पूँजीवाद, वामपंथ, दक्षिणपंथ की बजाय गाँधीवाद, लोहियावाद, अम्बेडकरवाद, मार्क्सवाद की प्रधानता है। जबकि विकसित देशों में समाजवाद, पूँजीवाद, वामपंथ या दक्षिणपंथ की विशुद्धता को प्रमुखता दी जाती है। यानी भारतीय जनमानस सिर्फ नेतृत्व चयन में ही नहीं वरन् विचाधारा चयन में भी व्यक्तिवाद को प्राथमिकता देता है। और अपने नेता एवं महापुरुष के आगे सभी अन्य नेताओं और महापुरुषों को तुच्छ समझता है। यहाँ तक कि दूसरे नेता या महापुरुषों की विचारधाराओं को वो जानने का भी प्रयास नहीं करता है। संभवतः भारतीय जनमानस की इस मनःस्थिति का मुख्य कारण उसके लम्बे समय तक राजशाही अथवा गुलामी में रहने की वजह से उत्पन्न हुई है। भारतीय आवाम राजशाही से मुक्त होते ही गुलामी में जकड़ गया और बीस शताब्दी तक इसी अवस्था में रहा। अभी इस आवाम को आजाद हुये मात्र कुछ दशक ही बीते हैं। अतः नेतृत्व एवं विचारधारा में व्यक्तिवाद का प्रभावशाली होना कोई आश्चर्य नहीं है। व्यक्तिवाद प्रभावी राजनीति पर डा० लोहिया ने कहा था कि भारतीय लोकतंत्र नागपंचमी के त्योहार जैसा है जिसमें जनमानस मतदान के दिन किसी व्यक्ति में आस्था प्रकट करता है और फिर पाँच वर्षों तक उसको डण्डा लेकर दौड़ाता और मारता है। कच्छप गति से ही सही परन्तु यह सुखद संदेश है कि भारतीय लोकतंत्र मजबूती की तरफ अग्रसर है। इस सात दशकों में जनमानस राजा-महाराजाओं, जमींदारों को नेता बनाना छोड़ चुका है। जातिय एवं साम्प्रदायिक आधार पर नेतृत्व चुनने को भी पीछे छोड़ता जा रहा है। 2014 का आम चुनाव इसका उदाहरण है। जिसमें जनमानस ने जाति और धर्म से ऊपर उठकर मतदान किया। अब यह वर्तमान नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह इस जनभावना को और मजबूत करने का प्रयास करता है या पुनः जनमानस को जातीय एवं धार्मिक कीचड़ में ढ़केल देता है। यह वर्तमान नेतृत्व की कार्यप्रणाली तय करेगी। नतीजा चाहे जो कुछ भी हो परन्तु यह तो स्पष्ट हो रहा है कि जनमानस विशुद्ध लोकतंत्र के रास्ते पर चल पड़ा है।
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Posted On:  15/Oct/2016
Auther Name:  सुमन बी. आनन्द
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123
 
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