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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

Youth
 
Article Title:  मान्यतायें और व्यक्तित्व

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Article Content:  किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके मन मस्तिश्क में स्थापित मान्यताओं का प्रतिविम्ब होता है। व्यक्तित्व का आधार स्थापित मान्यतायें ही हैं। दया, परोपकार, अहिंसा, सेवा, सहायता के भाव की मान्यतायें जिस व्यक्ति के मन-मस्तिश्क में स्थापित हों, वो कभी हिंसक व्यक्तित्व का व्यक्ति नहीं हो सकता। इसके विपरित यदि किसी व्यक्ति के मन-मस्तिश्क में हिंसा, घृणा, कुटिलता, प्रताड़ना, कश्ट देने के भाव की मान्यतायें स्थापित हो, वह व्यक्ति कभी दयालु एवं परोपकारी नहीं हो सकता। इसी प्रकार झूठ, फरेब, जालसाजी, धोखा, ठगी के भाव की स्थापित मान्यताओं का व्यक्ति किसी भी सूरत में, विष्वसनीय एवं इमानदार व्यक्तित्व का स्वामी नहीं हो सकता जबकि सत्य, इमान, कर्म के भाव की स्थापित मान्यताओं वाला व्यक्ति, विपति के समय में भी इमानदार व्यक्तित्व का ही स्वामी रहता है। वह परिस्थितिओं का दास नहीं बल्कि परिस्थितियाँ उसकी दास होती हैं। एक कटु सत्य यह भी है कि बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल व्यक्ति अपने मन मस्तिश्क में स्थापित मान्यताओं के स्वभाव के अनुसार ही करता है। अतः उच्च षिक्षित व्यक्ति के व्यक्तित्व का आकलन सत्यनिश्ठ इमानदार और परोपकारी कर लेना, भारी भूल साबित होगी। व्यक्ति चाहे, जितनी भी उच्च षिक्षा ग्रहण कर लिया हो अगर उसकी स्थापित मान्यातायें सत्य, निश्ठा, कर्म, परोपकार, दया के भाव की नहीं हैं तो वह कदापि इमानदार एवं सत्यनिश्ठ व्यक्तित्व वाला नहीं हो सकता, हाँ अपनी बुद्धि के प्रयोग से इसका ढ़ोग अवष्य कर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छिपा अवष्य सकता है। अतः उच्च षिक्षित व्यक्ति को अच्छे व्यक्तित्व का स्वामी और अषिक्षितों को बुरे व्यक्तित्व वाला समझना उचित नहीं होगा। अधिसंख्य मान्यतायें षैषव काल से वाल्यकाल में ही स्थापित होती हैं। मान्यताओं की सबसे बड़ी खराबी यह है कि ये स्थापित तो बहुत जल्दी एवं आसानी से होती हैं, परन्तु टूटती बड़ी देर और बहुत मुष्किल से होती हैं। यह बच्चे या व्यक्ति के बुद्धि के स्तर पर निर्भर करता है। मान्यताओं के स्थापित होने के लिये एक-आध बार की सामान्य जानकारी, अथवा कुछ वार के स्मरण पर्याप्त होता हैं, परन्तु टूटने के लिये उनका लाखो वार असफल या झूठ साबित होना आवष्यक होता है। कुछ मान्यताये तो इसके वाद भी ताउम्र वनी रहती हैं। मान्यताओं के स्थापित होने के मुख्य केन्द्र परिवार, पास-पड़ोस एवं प्राथमिक विद्यालय हैं। जहाँ एवं जिस परिवेस में बच्चे की परवरिस षुरू होती है। परिवार के आपसी रिष्ते, पास-पड़ोस के माहौल और लोगों की स्थापित मान्यतायें, विद्यालय के पाठ्यक्रम एवं षिक्षकों और सहपाठियों के आपसी व्यवहार बच्चे के मन-मस्तिश्क में स्थापित होने वाली मान्यताओं की पृश्ठभूमि तैयार करते हैं। अतः किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का नब्बे प्रतिषत निर्धारण तो उसके दस-पन्द्रह वर्श की उम्र आते-आते ही हो जाता है। वैसे मान्यताओं की स्थापना एवं टूटने का क्रम ताउम्र चलता रहता है, परन्तु मुख्य भूमिका वाल्य काल का ही होता है। उदाहरण स्वरूप यदि साल-दो साल का बच्चा जब किसी परिजन या भाई-बहन को मारता है और सभी सदस्य हँसते हुये उसका पक्ष लेते हैं तो उसके मन में स्थापित हो जाता है कि यह अच्छा काम है, इससे सब खुष होते हैं, उसे भाई-बहन या अन्य परिजन के घाव, दर्द या रोने का आभास या पष्चाताप नहीं होता। अगर यही स्थिति उसके कुछ और बड़े होने तक बनी रहती है तो हिंसा मान्यता के रूप में उसके मन-मस्तिश्क में स्थापित हो जाती है और वह हिंसक प्रवृति का हो जाता है। उसमें दूसरो के दर्द को एहसास करने की प्रवृति खत्म हो जाती है। वह सामान्यतया हिंसक ही हो जाता है। इसी तरह चुरा के कुछ खाने, तोड़ फोड़ करनें, गन्दे षब्दों के प्रयोग इत्यादि पर परिजनों की प्रतिक्रिया गलत मान्यताओं को और सहायता करने, सत्य बोलने, छुपायी वस्तुओं को ढूढ़कर लाने पर प्रोत्साहित करने वाली परिजनों की प्रवृति अच्छी मान्यताओं को स्थापित करती हैं। कभी-कभी यह भी देखनें में आता है कि किसी-किसी व्यक्ति में अकस्मात एकदम परिवर्तन आ जाता है। उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व एकदम से बदल जाता है। यहाँ तक कि वह अपना स्थापित कारोबार, अकूत सम्पति सब भी त्याग देता है या दान कर देता है। कुछ लोग सारी षान-षौकत, सुख-सुविधा त्याग कर सामान्य जीवन यापन करने लगते हैं। कुछ एकदम से धार्मिक प्रवृति के तो कुछ एकदम विपरित प्रवृति धारण कर लेते हैं। वास्तव में ऐसा व्यक्ति के अन्दर स्थापित ढे़र सारी मान्यताओं के एक साथ टूट जाने की वजह से होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्तित्व में एकदम परिवर्तन आ जाता है, साधू चोर एवं चोर साधू हो जाते हैं। ठग परोपकारी एवं परोपकारी ठग हो जाते हैं। वास्तव में ये स्थापित मान्यतायें ही व्यक्ति के कार्य व्यवहार को नियंत्रित एवं निर्धारित करती हैं, इनका अचानक भारी संख्या में टूटना सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ही परिवर्तित कर देेता है। स्थापित मान्यताओं की संख्या व्यक्तित्व के आयामों को प्रदर्षित करती हैं। अधिक स्थापित मान्यताओं का स्वामी बहुआयामी व्यक्तित्व वाला होता है। जबकि सीमित मान्यताओं वाला व्यक्ति कमजोर व्यक्तित्व वाला होता है। वर्तमान समय की जीवन षैली जिसमें एकल परिवार का प्रचलन है अधिकंाषतः कमजोर व्यक्तित्व के निर्माण का मुख्य कारण वनता जा रहा है। बच्चों की सीमित सम्पर्क एवं अनावष्यक रोक-टोक अथवा स्टेटस (जीवन स्तर) के आधार पर रिष्ता बनाना, कमजोर व्यक्तित्व का निर्माण कर रहा है। षहरी अभिजात्य वर्ग का ध्यान इस बात पर क्यों नहीं जा रहा है, यह आष्चर्य ही है। वास्तव में सीमित सम्पर्क की वजह से बच्चे के मन-मस्तिश्क में सीमित मान्यताये ही स्थापित हो पाती है, जो उसके कार्यव्यहार एवं व्यक्तित्व में दिखायी देती हैं। मान्यताओं के गुण-दोश तो बाद की बात है। छोटे बच्चों की छात्रावासीय षिक्षण प्रणाली भी एक अन्य प्रभावषाली कारण, वर्तमान जीवन षैली में देखने को मिल रहा है। छात्रावासीय बच्चे, किताबी ज्ञान तो रट लियें हैं परन्तु वे व्यवहारिक ज्ञान से प्रायः अनभिज्ञ ही रहते हैं। वास्तव में घर और स्कूल मान्यताओं की स्थापना में बराबर का योगदान करते हैं। कभी घर पर प्राप्त जानकारी का प्रयोषाला विद्यालय तो कभी विद्यालय में प्राप्त जानकारी की प्रयोगषाला घर या मुहल्ला बनता है अर्थात घर और विद्यालयों की भूमिका जानकारी देनी वाले केन्द्र एवं प्रयोगषाला के रूप में अदलती-बदलती रहती है। अतः बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व की स्थापना हेतु स्वस्थ घर परिवेष एवं अच्छा विद्यालय दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। एक धामिक व्यक्तित्व के अन्दर स्थापित मान्यतायें मूलतः बचपन में ही स्थापित हो जाती है। इसमें घर अथवा परिवेष की मुख्य भूमिका होती है। कुछ-कुछ धर्म आधारित विद्यालयों, मदरसों, मठीय स्कूल भी ऐसी मान्यताये स्थापित करते हैं। ज्यादातर धार्मिक मान्यतायें परिजनों द्वारा डर या भय दिखाकर स्थापित की जाती हैं। कुछ मान्यताये सुखमय भविश्य का लालच, संकट में रक्षा, परिस्थितियों में सहायता की उम्मीद जगाकर भी स्थापित की जाती हैं। इस डर, उम्मीद, सहायता, रक्षा के सव्जवाग से स्थापित की जाने वाली मान्यतायें अक्सर धर्म भीरू व्यक्तित्व का ही निर्माण करती हैं। धर्म के सही मायनें या ज्ञान मूद रहस्य प्रायः गौड़ ही रह जाते हैं। अनिश्ट की आषंका अक्सर प्रचलित मान्यताओं से आगे की सोच के रास्ते में रूकावट का ही काम करती हैं। कुछ लोग तो यहाँ तक कहतें हैं कि धर्म तर्क की चीज नहीं, आस्था या माननें की चीज होती है। अर्थात तर्क की कोई गुंजाइस नहीं होती, जो धर्मभीरू व्यक्तित्व पैदा होने की सबसे बड़ी वजह बनती है। इसके अलावा पाखण्डियों द्वारा प्रचारित गुनाहों और पापों की सूची भी एक उम्र आते-आते सभी व्यक्तियों के मन में कुण्ठा पैदा कर देती है कि उसने इतने ज्यादा पाप और गुनाह अबतक कर दिये हैं कि अब उपरवाला उसे नर्क या दोजख में भी जगह नहीं देने वाला। अब उसके जीवन में आनेवाली समस्त वाधायें, परेषानियाँ उन्हीं पापों की वजह से है और उसका दुखद अन्त अवष्यम्भावी है। ये कुण्ठायें व्यक्ति के सारे व्यक्तित्व का हनन कर जाती हैं और धर्मभीरू व्यक्तित्व के रुप में स्थापित कर देती हैं जो अपने साथ-साथ आगामी पीढि़यों का भी वंटाधार कर उनको भी धर्मभीरू और कुण्ठाग्रसित कर देता है। कवियों, साहित्यकारों, गीतकारों, कलाकारों के मन मस्तिश्क में स्थापित मान्यतायें, प्रायः सौन्दर्य, करूणा, दया, प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, समानता, दर्द, दुःख के भावों द्वारा स्थापित हुई रहती है। इनके व्यक्तित्व में प्रायः यही भाव स्थापित रहते है, जो इनके कृतित्व में परिलच्छित होते हैं। जहाॅ कवियों एवं गीतकारों में सौन्दर्य, प्रेम, दया, करूणा का प्रभाव प्रबल रहता है वही साहित्यकारों मे समानता, सहानुभूति, विद्रोह इत्यादि का भाव प्रबल रहता है। कलाकार की भी मान्यतायें कवियों एवं साहित्यकारें जैसी ही होती है परन्तु उनमें कृतित्व का अभाव होता है वे प्रायः कृतित्व को प्रभावषाली तरीके से प्रस्तुतिकरण में सक्षम होते हैं। कभी किसी ने किसी आतंकवादी या अपराधी को कविता या साहित्य लिखते, या मंचन करते हुए नहीं देखा या सुना होगा। साहित्यकार अथवा कलाकार को भी अपराध करते नहीं देखा जाता है। वास्तव में निहित मान्यतायें विपरित स्वभाव के कार्यों को करने की इच्छा ही पैदा नहीं होने देती। कभी-कभी विरलतम् एक-आध उदाहरण मिलेगें भी तो उसका कारण ढे़र सारी स्थापित मान्यताओं का टूट जाना ही होगा अन्यथा यह असंभव ही है। सारांष रूप में यह कहा जा सकता है कि स्वस्थ समाज की स्थापना हेतु अच्छे व्यक्तित्वों का पैदा होना आवष्यक हैं एवं अच्छे व्यक्तित्व की अधिकता वाले समाज की स्थापना के लिये, बच्चों में स्वस्थ मान्यताओं की स्थापना करना आवष्यक है। बिना स्वस्थ्य मान्यताओं की स्थापना किये अच्छे व्यक्तित्व एवं अच्छे समाज की कल्पना बेमानी है। अतः समाज को विद्यालयों, घरेलू रिष्तों एवं पास-पड़ोस के परिवेष के षुद्धिकरण एवं परिमार्जन की आवष्यकता पर विचार करना चाहिए। मात्र नामचीन विद्यालयों मे नामांकन पर्याप्त नही होगा घर और परिवेष का षुद्धिकरण भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बहुआयामी व्यक्तित्व की पैदावार हेतु वहुआयामी मान्यताओं की स्थापना की जरूरत है, रोक-टोक, सीमित पारस्परिक सम्बन्ध, धर्मभीरूता के द्वारा बहुआयामी व्यक्तित्व की स्थापना का मार्ग अवरूद्ध होगा। अतः एक वार खुले मन से इसकी समीक्षा एवं पुर्नस्थापना पर विचार कर लेना आवष्यक है।
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Posted On:  16/Mar/2017
Auther Name:  सुमन वी0 आनन्द
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Article Title:  समाज का भावी स्वरूप/चरित्र की खेती

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Article Content:  किसी भी समाज का भावी स्वरूप उस समाज के जागरूक लोगों द्वारा निर्धारित किया जाता है। जागरूक लोग जैसा चाहते हैं, उस समाज का भावी स्वरूप भी वैसा ही बनता है। समाज अपने आप नहीं बनता, वरन् उसके स्वरूप का निर्धारण किया जाता है। जो समाज जिस प्रकार के लोगों को सम्मानित करता है अथवा जो समाज जिस प्रकार के लोगों को महिमामण्डित करता है या नायक के रूप में मान्यता देता है, उस समाज का भावी स्वरूप उसी प्रकार का हो जाता है क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ उसी का अनुसरण करती हैं। सम्मानित होना अथवा प्रशंसा का पात्र होना मनुष्य की स्वभाविक कमजोरी है, अतः जो समाज जिस प्रकार के लोगों को सम्मानित का दर्जा देता है अथवा प्रशंसा करता है, उस समाज की भावी पीढ़ियाँ उसी प्रकार के व्यक्तित्व को विकसित कर सम्मानित होने अथवा प्रशंसा पात्र बनने का प्रयास करती हैं एवं समाज का भावी स्वरूप भी खुद-ब-खुद निर्धारित हो जाता है। इतना ही नहीं, जो परिवार जिस प्रकार के व्यक्तियों को ज्यादा सम्मान ज्ञापित करता है अथवा आदर भाव प्रदर्शित करता है, उस परिवार के बच्चों के अवचेतन मन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है और उस परिवार के बच्चे भी अपने आप में उसी प्रकार के व्यक्तित्व विकसित कर अपने परिवार में एवं समाज में सम्मानित होना एवं आदर भाव प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। जिस प्रकार एक प्रोफेसर अथवा शिक्षक को आदर भाव देने वाले परिवार में प्रोफेसर अथवा शिक्षक पैदा होने की संभावनाएँ प्रबल हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार एक अपराधी या जालसाज को आदर भाव देने वाले परिवार में अपराधी एवं जालसाज पैदा होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। अतः समाज का भावी स्वरूप स्वयं समाज अथवा परिवार ही निर्धारित करता है। बनारस एवं मुम्बई उपर्युक्त तथ्यों के दो सशक्त उदाहरण हैं। काशी के समाज ने सदैव से विद्वानों, महात्माओं, ईमानदारों एवं बुद्धिजीवियों को सम्मान एवं आदर भाव प्रकट किया है। परिणामस्वरूप वहाँ पर बुद्धिजीवियों एवं विद्वानों का सदियों से अम्बार लगा रहा। अनेक महान व्यक्तित्व काशी की धरती पर पैदा हुए। संत कबीर, संत रविदास, संत कीना राम, मुंशी प्रेमचन्द इत्यादि ऐसे विद्वान पैदा हुए जो सदियों तक हमारे समाज को अवलोकित करते रहेंगे। इसकि अतिरिक्त अन्य विद्वान जो काशी के समाज ने पैदा किये, उनकी गिनती हजारों नहीं, लाखों में होगी। कुछ यही स्थिति कोलकाता की भी है। वहाँ के समाज ने भी लाखों की संख्या में विद्वान, कालजयी रचनाकार, पेन्टर, विचारक पैदा किये हैं। इसके ठीक विपरीत मुम्बई के समाज ने एवं बॉलीवुड ने माफियाओं को महिमामण्डित किया, नतीजतन वहाँ दाऊद इब्राहीम, वरद राजन, अबू सलेम, छोटा राजन, छोटा शकील इत्यादि अन्डरवर्ल्ड डॉन एवं लाखों की संख्या में माफिया पैदा हुए जो आज भी मौजूद हैं और आगे भी पैदा होते रहेंगे। अर्थात् वहाँ का समाज अपराधियों को महिमामण्डित करने की सजा भुगत रहा है, जबकि काशी सुख-चैन से नित्य नये विद्वता के आयाम स्थापित कर रहा है। मुम्बई की हालत कुछ-कुछ पूर्वी क्षेत्र के हमारी दो राजधानियों का भी है जहाँ पर घोटालेबाज, अपहरणकर्ता, दलाल, माफिया, तस्कर इत्यादि महिमामण्डित हो रहे हैं। यहाँ के भी हालात मुम्बई से अलग नहीं हैं। अगर यहाँ का समाज अविलम्ब जागरूक नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब यहाँ भी दाऊद, हाजी मस्तान, वरदा और छोटा राजन पैदा होने लगेंगे, अपहरण का दर्जा प्राप्त करते, घोटालों की गिनती न हो सके और स्वचालित बन्दूकों की आवाज स्त्रियों, बच्चों के करुण क्रन्दन आम बात हो जाय। बॉलीवुड के विपरीत काशी क्षेत्र के रंगकर्मियों एवं रचनाकारों ने हरीश चन्द्र, होरी, सती बिहुला, मजदूरी, मेहनत, नमक का दरोगा, पूस की रात, आल्हा-ऊदल इत्यादि को जीवित रख काशी के समाज में प्रोम, दया, देश प्रेम, स्वाभिमान, जमीर, विद्वता आदि का बीज बोया है जो फसल के रूप में आज काशी क्षेत्र के चारों तरफ लहलहा रहा है। जिस प्रकार प्रकृति में सभी प्रकार की वनस्पतियाँ मौजूद हैं, ठीक उसी प्रकार समाज में भी सभी प्रकार के मनोभाव मौजूद हैं। चोर, डकैत, अपहरणकर्ता, हत्यारे, घोटालेबाज, ठग, अपराधी इत्यादि मनोभावनाएँ हैं जो समाज के मनुष्यों में विद्यमान रहती हैं। जो समाज जिस प्रकार की भावनाओं को प्रश्रय देना अथवा महिमामण्डित करना शुरू करता है, वह समाज उसी मनोभावना वाले व्यक्तियों से अच्दादित हो जाता है। बाद में वही समाज उन्हीं मनोभावनाओं से प्रताड़ित होता है और कोसना शुरू कर देता है। दरअसल समाज भी एक खेत की भाँति है। जिस प्रकार किसान अथवा माली अपने खेत अथवा बाग में अवांछित वनस्पतियों को काटकर वांछित वनस्पतियों को पोषित कर अपने खेत अथवा बाग का स्वरूप निर्धारित करता है कि कौन-सा फसल अथवा किस रंग का फूल या कौन-सा फल उसके खेत अथवा बाग में पैदा होगा, ठीक उसी प्रकार जागरूक समाज भी नकारात्मक मनोभावनाओं की उपेक्षा कर एवं सकारात्मक भावनाओं को प्रश्रय देकर भावी समाज का स्वरूप निर्धारित करता है। धान की फसल अथवा गुलाब की बगिया बनाना है तो दूब, मोथा, मकडा, झाणी, झन्खाण, मूंज, पतहर इत्यादि को काटना ही पड़ेगा और धान एवं गुलाब में खाद-पानी देकर विकसित करना पड़ेगा। ऐसे ही मेहनती, ईमानदार, विद्वान, देशभक्त, बुद्धिमान, सहिष्णु समाज की स्थापना के लिए अपराध, हिंसा, चोरी, कालाबाजारी, बेईमानी, घोटालेबाजों को महिमामण्डित करने की बजाय हतोत्साहित करना अपरिहार्य होगा, तभी स्वस्थ समाज की कल्पना की जा सकती है। सामाजिक शोध हेतु समाजशास्त्री दो शहरों का चुनाव कर एक शहर के मुहल्लों एवं चौराहों का नामकरण हाजी मस्तान नगर, दाऊद इब्राहिम चौक, अबू सलेम नगर, छोटा राजन मार्ग, वरद राजन पार्क, संतोवेन जडेजा चौक, छोटा शकील मार्ग, तेलगी नगर, हर्षद मेहता मार्ग, शोभराज मार्ग, नटवरलाल चौक, कार्लोस नगर, लादेन नगर, प्रभाकरण चौक, वीरप्पन चौक, कसाब नगर, ददुआ मार्ग, फूलन चौक, क्वात्रोची चौक एवं दूसरे नगर के मुहल्लों, गलियों एवं चौकों के नामकरण टैगोर मार्ग, प्रेमचन्द मार्ग, विनोवा भावे मार्ग, विवेकानन्द मार्ग, दयानन्द सरस्वती नगर, नेहरू नगर, गाँधी चौक, सूरदास चौक, सुभाष चौक, राजेन्द्र मार्ग, अम्बेडकर नगर, कबीर नगर, पटेल मार्ग, लिंकन मार्ग, फिदेल कास्त्रो मार्ग, मण्डेला चौक, रैदास मार्ग, मारग्रेट थ्रैचर नगर, सरोजनी नायडू नगर, तिलक नगर, अबुल फजल मार्ग, फिराक मार्ग, इकबाल मार्ग, नीरज नगर इत्यादि रखा जाए एवं पाँच वर्ष के उपरान्त दोनों शहरों में रहने वाले बच्चों की मानसिकता का आकलन किया जाय तो निश्चित रूप से इन शहरों के लोगों के व्यवहार एवं मानसिकता में स्पष्ट अन्तर दृष्टिगोचर होगा। दुर्भाग्यवश आज प्रथम प्रकार के नामकरण की परम्परा प्रभावी हो रही है। गलत तरीके से प्रभावशाली हुए लोग प्रतिष्ठित हो रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी उनके नाम पर गली, मुहल्लों का नामकरण भी करते जा रहे हैं, परन्तु इन कृत्यों का भावी पीढ़ियों पर पड़ने वाले असर से हम सब निश्चिन्त हैं, जो बहुत ही बड़ी चिन्ता का सबब है। ऐसा लगता हैः - अब खमीजों की ही बनेंगी मजारें। और लोग इबादत करेंगे। अर्थात अगर समाज ने इस पर अविलम्ब ध्यान नहीं दिया तो कुछ समय बाद वाद-विवाद, चारित्रिक एवं नैतिक पतन रोकना असंभव हो जाएगा। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि समाज के भावी स्वरूप के निर्धारण का कार्य समाज द्वारा ही किया जाता है और यह उस समाज के वर्तमान मनोभावों पर निर्भर करता है एवं निर्धारित भी होता है। वर्तमान समाज जैसी कल्पना अपने भावी समाज हेतु करेगा, उस समाज का भावी स्वरूप वैसा ही होगा। अतः यह उस समाज पर निर्भर करता है कि अमुक समाज अपने भावी स्वरूप को कैसा रखना चाहता है। अर्थात यदि समाज चाहे तो अपने भावी समाज का स्वरूप निर्धारित कर सकता है, यह न तो अतिशयोक्ति है और न ही असम्भव।
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Posted On:  15/Mar/2017
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
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Jessie  Says : Could you please repeat that? http://ttstaller.com diflucan "We found greater activity in an area of the brain called the ventral striatum, which is a reward center, involved in processing reward, motivation and pleasure," lead scientist Dr. Valerie Voon told the Sunday Times in the UK.
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