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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

CULTURAL
 
Article Title:  रमज़ान का महीना और इफ्तार की दावतें

Article Content:  रमजान के पवित्र महीने में इफ्तार की दावतों का बाजार गर्म रहता है। सियासी जगत की बड़ी-बड़ी हस्तियों से लेकर, क्षेत्रीय स्तर के सियासी लोग इफ्तार की दावतों के बड़े-बड़े आयोजन करते हैं। इनके अलावा कुछ नये जमाने के जये व्यवसायों से जुड़े लोग, तालीम व्यवसायी, बीमा संचालक से लेकर कुछ सरकारी हुक्मरान भी इन दावतों के आयोजन में बढ़-चढ़ कर शिरकत करते हैं। इन दावतों के आयोजन में दावतनामें बाटे जाते हैं और सभी वर्गों के मानिन्द लोगो को निमंन्त्रित किया जाता है। खबरनवीसों को विशेष तरजीह दी जाती है। जिस दावत को आयोजन सियासी हस्तियाँ कर रहीं हों, सियासी जमात का जमावड़ा हो और खवर न वनें, तस्वीरें अखबारों में न छपें, उस क्षेत्र विशेष की उस दिन के अखबार के मुख्य पृष्ठ की , वही आयोजन सनसनीं न बनें तो पूरे आयोजन का जायका ही खराब हो जाता है। बहरहाल हालात जो भी हों पर आजकल दावतों के दौर का बाजार काफी गर्म है। और ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि 2014 की सियासी जंग की रणभेदी जो बज चुकी है। ऐसे में कोई भी सियासतदाँ पीछे कैसे रह सकता है। अगर इन दावतों पर गौर फरमाया जाय तो नतीजा यह निकलता है कि लगभग 95 प्रतिशत ऐसे लोग इन दावतों में शरीक होते हैं जो रोज़ा नही रहते। अधिकांश हाजरात तो दूसरे धर्मो के होते है परन्तु एक खासियत उनमें जरूर होती है, वे सियासी नजरिये से महत्वपूर्ण अवश्य होते हैं। इस्लाम धर्म में इफ्तार की दावतों के आयोजन का मक़सद कुछ और ही है परन्तु इस सियासत ने इसका चेहरा ही बदल दिया है। रमज़ान का पाक महीना मुसलमानों के लिये बहुत ही खास होता है। हर अमीर-गरीब, छोटे-बड़े मुसलमान की खवाहिश इस पाक महीने भर रोजा रख, परवरदिगार को अपनी अकीदत पेश करने एवं आगे के जीवन में खुशियाँ एवं अच्छी सेहत नवाजने के लिये इबादत करने की होती है। वह अल्लाहताला को उसके ऊपर किये गये रहमोकरम के लिए, शुक्रिया अदा करना चाहता है। परन्तु आज जो हालात हैं उसमें एक माह तक बिना खाये-पिये मेहनत-मजदूरी करने के साथ रोज़ा रख पाना बड़ा ही मुश्किल होता है। उसकी कमाई से एक व्यक्ति नहीं पूरे एक कुनबे की परवरिश होती है। उसके अलावा जो लोग खुदा-न-खास्ता बीमार हैं या दुर्बल हैं उनके लिये तो रोजा खोलने तक की व्यवस्था करना भी नामुमकिन है। रोजा खोलने का वक्त नीयत है जो लोग किसी कारणवश सफर पर हैं यदि वे समय पर घर नहीं पहुँच पाये तो उनको सफ़र में ही रोजा खोलना पड़ता है। बहुत परिवार ऐसे भी है जिनमें एक व्यक्ति की कमाई से पूरे कुनबे का पेट भरता है। कुछ मुसलमान भाई ऐसे पेशे से जुड़े होते हैं जिन पेशों में हाड़तोड़ मेहनत पड़ती है। इफ्तार की दावतों का मकसद यही होता है कि अमीर लोग ऐसी दावतों का आयोजन करें जिसमें आस पास के मेहनतकश, लाचार, गरीब, दुर्बल, बेसहारा एवं दीन-हीन रोजादार भी परवरदिगार को अपनी इबादत पेश कर सकें। गरीबी-लाचारी अथवा सफर में होने की बजह मात्र से किसी रोजेदार का रोजा न खराब हो। उसे इस बात का मलाल न रह जाये कि इस पवित्र रमजान के महीने में उसकी गरीबी की वजह से उसका रोजा खराब हो गया। जरूरत धर्मों से ज्यादे उनके मर्मों को समझने की है और इफ्तार की दावतों का धार्मिक मर्म यह है कि अभाव में किसी गरीब का रोज़ा ना टूटने पाये ना कि उन लोगों को बुलाकर दावतें उड़ाने की जो रोज़ा ही नहीं है। अगर किसी क्षेत्र में किसी भी रोजेदार का रोज़ा टूटता है तो या तो उस क्षेत्र में कोई अमीर मुसलमान नही है या आम जमात में आपसी प्रेम-सद्भाव नही है या कोई धर्मनिर्पेक्ष हिन्दू, सिक्ख, इ्रसाई धर्म तो जानता है परन्तु धर्म का मर्म नहीं जानता। गर इफ्तार की दावतें करनी है तो इन्हे रेलवे स्टेशनों, बस स्टेशनों, मुसाफिरखानों, गरीबों की बास्तियों में करो, जिससे किसी गरीब, लाचार अथवा मुसाफिर का रोज़ा ना टूटने पाये।
Article Subject: 
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Posted On:  15/Oct/2016
Auther Name:  सुमन बी. आनन्द
Article ID: 
Article Title:  दीपावली

Article Content:  दीपावली का पर्व वर्षा ऋतु की समाप्ति एवं शरद ऋतु के आगमन के संधिकाल में पूरे भारत वर्ष में हिन्दू समुदाय के लोगों द्वारा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व के आयोजन के पूर्व घरों की खूब साफ-सफाई की जाती है, घरों की रंगाई-पुतायी करायी जाती है, नये वस्त्र बनवाये जाते हैं, पुराने समानों, बर्तनों, मशीनों, औजारों की या तो मरम्मत कराकर ठीक करा लिया जाता है अन्यथा यदि ठीक होने लायक नहीं है तो उनकी जगह नये समान खरीदे जाते हैं। दीपावली के दिन पूरे घर में और बाहर दीप जलाकर प्रकाशमान किया जाता है और सारे पुराने अप्रयोज्य सामानों को हटाकर उनकी जगह नये सामान लगाये जाते हैं। कुल मिलाकर यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि एक नये जीवन की शुरुआत इस दिन से की जाती है। पुराने कष्टों, दुखों, अभावों, परेशानियों का त्याग कर नवजीवन एवं नव उत्साह का सृजन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन लोग घर की साफ-सफाई कर दीप जलाकर महालक्ष्मी का आहवान करते हैं कि लक्ष्मी जी उनके घर पधारें एवं उनके घर को धन एवं सुख-सम्पदा का आर्शीवाद दें। शुद्ध एवं अच्छे पकवान बनाकर महालक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है एवं भोग लगाया जाता है। दीपावली के एक दिन पूर्व की भोर में दरिद्र नारायण को घर से बाहर खदेड़ा जाता है। इसके लिए सूप पर दिया रखकर हँसुए से पीट-पीट कर आवाज निकाली जाती है और घर के कोने-कोने में जाकर दरिद्र नारायण को घेर कर घर से बाहर निकाल कर उनको खदेड़ते हुए गाँव से बाहर किया जाता है। गाँव के प्रत्येक घर से दरिद्रनारायण को निकाल दिया जाता है। गाँव से बाहर खदेड़ने के बाद सूप को गाँव के बाहर फेंक दिया जाता है जिसको गाँव के लड़के जलाकर आग सेकते हैं। गाँवों में यह मान्यता है कि दरिद्र खेदने वाले सूप को जलाकर उसकी आग तापने से सेहुला नामक चर्म रोग ठीक हो जाता है। दरिद्र खेदने के बाद अगली शाम को घर-घर में दीप जलाकर महालक्ष्मी के आगमन की प्रतीक्षा की जाती है। दीपावली के एक-दो दिन पूर्व धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक घर में नये-नये बर्तन खरीद कर लाये जाते है और उन्हीं बर्तनों में दीवाली के दिन पकवान बनाकर माता लक्ष्मी को भोग लगाया जाता है। उस दिन प्रत्येक घर में कम से कम एक बर्तन आना अनिवार्य है। इस प्रक्रिया में घर का पुराना या टूटा हुआ बर्तन स्वतः ही हट जाता है और उसकी जगह नया बर्तन ले लेता है। उपर्युक्त धार्मिक एवं सामाजिक महत्वों के अतिरिक्त इस पर्व के कुछ वैज्ञानिक तथ्य भी हैं जिनको आजकल महत्व नहीं दिया जा रहा है। दीपावली के समय सम्पूर्ण वातावरण विभिन्न प्रकार के कीट-पतंगों से भरा रहता है। ये कीट-पतंगे रौशनी की तरफ आकर्षित होते हैं और दीपक की लौ से जलकर खत्म हो जाते हैं। कुछ कीट-पतंग दीप जलाने के प्रयोग में लाये जाने वाले तेल में डूबकर भी मर जाते हैं। अतः दीपावली वातावरण शुद्धि में भी उपयोगी है। कीट-पतंगों की समाप्ति से फसलें एवं मानव दोनों ही रोग ग्रसित होने से सुरक्षित हो जाते हैं। यह सर्वविदित भी है कि दीपावली के पूर्व कीट-पतंगों से पूरा वातावरण भर जाता है और शाम होते ही उनका आक्रमण तेज हो जाता है। इस प्रकार दीपावली हमें कीट-पतंग जनित रोगों से मुक्त करती है और हमारी फसलों को भी बर्बाद होने से बचाती है। यह कहा जा सकता है कि दीपावली का धार्मिक एवं सामाजिक महत्व के साथ वैज्ञानिक महत्व भी अति विशिष्ट है। परन्तु आज के दौर की विडम्बना यह है कि आज का समाज इस पर्व के वैज्ञानिक महत्व का विश्लेषण किये बगैर ही दीया-बाती की जगह विद्युत चालित रंग-बिरंगी झालरों से घर सजाना पसन्द कर रहा है। परिणामस्वरुप दीपावली का पर्व खत्म होने के पश्चात् भी महीनों तक कीट-पतंगे वातावरण में मौजूद रहते हैं और फसलों एवं मानवों को रोग ग्रसित करते रहते हैं। आज से कुछ सालों पूर्व तक घरों की रंगाई-पुताई या तो चूने से करायी जाती थी या रामराज मिट्टी का प्रयोग किया जाता था। परन्तु चूने व रामराज मिट्टी से रंगाई में एक तो घर की चमक-दमक अथवा रौनक उतनी नहीं हो पाती थी जितनी की आज के रंग-बिरंगे पेन्ट की रंगाई द्वारा आ जाती है, दूसरे चूना एवं रामराज मिट्टी सूखकर गिरने लगती है एवं दीवालों से स्पर्श होने पर कपड़ों एवं शरीर पर भी लग जाती है। फलस्वरुप आज हर घर की रंगाई रंग-बिरंगे पेन्टों से ही कराने का प्रचलन है। परन्तु अगर वैज्ञानिक दृष्टि से पूर्व के प्रचलन एवं वर्तमान फैशन की तुलना की जाय तो यह स्पष्ट होता है कि दीपावली का पर्व बरसात के बाद मनाया जाता है एवं उसके कुछ दिन पूर्व ही घरों की रंगाई करायी जाती है। बरसात में लगातार पानी बरसने की वजह से घर के छत, दीवारें एवं फर्श में सीलन रहती है। यह सीलन विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति की कारक होती है। चूने एवं रामराज मिट्टी का यह प्राकृतिक गुण है कि वह सीलन को सोख लेती है और पुतायी के बाद घर की दीवारें, छत एवं फर्श की सीलन लगभग समाप्त हो जाती है, अतः सूक्ष्म हानिकारक जीवों के घर में पैदा होने की संभावना भी खत्म हो जाती है। जबकि किसी भी महँगे से महँगे पेन्ट में सीलन सोखने की क्षमता नहीं होती। अतः हमारा घर पेन्ट द्वारा आकर्षक तो जरुर दिखता है, परन्तु इसकी कीमत हमारे परिवार को विभिन्न मौसमी रोगों की गिरफ्त में आकर चुकानी पड़ती है। मेरी समझ से हमारे वैज्ञानिकों को चूना, रामराज मिट्टी एवं वर्तमान पेन्टों का एक ऐसा मिश्रण तैयार करने का प्रयास करना चाहिये जिसमें आकर्षण एवं सीलन (नमी) सोखने की क्षमता दोनों ही मौजूद हो अन्यथा चमक की कीमत पर बीमारी खरीदना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती है। धर्म एवं तीज-त्योहारों की आड़ में कुछ ऐसी परम्पराओं का समायोजन हमारे ऋषि-मुनियों ने किया है जो आजतक अबूझ है। शायद हमारे चिकित्सा विज्ञान ने उनपर कभी गौर ही नहीं किया। परन्तु अवश्य ही इनका कोई दीर्घकालिन महत्व है अन्यथा ऐसी परम्पराओं के समायोजन का कोई तार्किक आधार समझ नहीं आता। दीपावली के दिन सूरन (ओल) के चोखा के सेवन की बाध्यता एक ऐसी ही परम्परा है जिसका कोई औचित्य तो नहीं समझ आता परन्तु मानव स्वास्थ्य पर इसका जरुर कोई न कोई दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता होगा। इस चोखा का सेवन आदमी परम्परागत बाध्यता से ही करता है, अन्यथा इसके सेवन के बाद गले में खुजली होने लगती है, सामान्य रूप में तो कोई भी इसे कभी खाये ही नहीं। ऐसे में विचारणीय प्रश्न यह है कि हमारे मनीषियों ने सूरन के चोखा खाने की प्रतिबद्धता की परम्परा क्यों डाली? इसका हमारे स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है? इसमे ऐसा क्या है जिससे वर्ष में एक बार भी थोड़ा-सा ही चख लेना आवश्यक है? इसके न प्रयोग करने से हमारे स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है? इस चोखे को दीवाली के दिन ही क्यों सेवन करना आवश्यक है? ऐसे तमाम प्रश्न है जिनका उत्तर मात्र वैज्ञानिकों द्वारा गहन शोध के बाद ही दिया जा सकता है। सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि हिन्दू समाज में दीपावली का त्योहार वातावरण की शुद्धि, स्वास्थ्य रक्षा एवं मन में नव उत्साह के संचार की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसके विभिन्न विधि-विधान मन में उत्साह एवं सुखमय भविष्य एवं समृद्धि की आधारशिला रखते हैं। अतः इसके धार्मिक सामाजिक पहलुओं के साथ-साथ वैज्ञानिक पक्ष को भी समझते हुए उत्साहपूर्वक मनाना चाहिए। शुभ दीपावली!
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Posted On:  15/Mar/2017
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
Article ID: 
12
 
COMMENTS:
 
Ralph Says: I came here to study https://weteachquran.com kamagra This large surge pushed way more water onto streets than might be expected in Manhattan, for example. The peak water level (the surge plus the tide) at the Battery, Manhattan's southern tip, was 14 feet (4.28 meters) above the average low tide level, according to National Oceanic and Atmospheric Administration figures cited in the paper.
on: 11/12/18
Terence Says: Good crew it's cool :) https://matrixglobal.net.id cipro DENVER (AP) — A Colorado judge on Wednesday ordered the release of the 1999 grand jury indictment in the killing of 6-year-old JonBenet Ramsey, possibly shedding light on why prosecutors decided against charging her parents in her death.
on: 11/12/18
Denis Says: Languages https://weteachquran.com cipro "We got 13 inches of rain in 3 days, and we usually get 18 inches of rain in a year. I've never seen anything like it," Alberts, 54, told The News. "It was like the kind of rains you see in the jungles of Colombia."
on: 09/12/18
Randal Says: I'd like to speak to someone about a mortgage http://soprof.com.mx diflucan Gore also said people need to thoroughly wash their hands after handling raw meat, and anyone who believes they were infected and is showing symptoms like diarrhea and abdominal cramps should contact doctors immediately.
on: 09/12/18
Oswaldo Says: I'm about to run out of credit http://www.ccpirapuato.com ventolin Delaware's arbitration system was shut down in 2012 by U.S.District Court Judge Mary McLaughlin, who found it essentiallyamounted to civil trials by another name, and that the secrecyviolated the First Amendment.
on: 09/12/18
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