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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

ECONOMICAL
 
Article Title:  सुरक्षित अर्थ व्यवस्था

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Article Content:  सुखी एवं सम्पन्न जीवन के लिए एक सार्वभौम सत्य को समझ लेना आवश्यक है कि जीवन में कुछ भी न तो स्थिर है और न ही स्थायी। अगर कुछ भी स्थायी या स्थिर नहीं है तो हमारी अर्थव्यवस्था स्थायी कैसे सम्भव है? अर्थात अन्य मसलों की तरह ही अर्थव्यवस्था भी गतिमान है और किसी भी गतिमान साधन पर सवारी करते समय जिस प्रकार निरन्तर संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए निरन्तर संतुलन बनाए रखना अतिआवश्यक है। पूरी दुनिया में ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है जिसमें निरन्तर संतुलन के बगैर आर्थिक स्थिरता बनी रहे। अतः बिन निरन्तर प्रयास के अर्थव्यवस्था सुदृढ़ रखने की कल्पना मात्र बेमानी है। यह पूर्णतया असंभव है, एक मन का धोखा है। जिस प्रकार गतिमान साधन की सवारी में संतुलन बिगड़ने पर दुर्घटना अवश्यंभावी है, ठीक उसी प्रकार अर्थ क्षेत्र में लापरवाही या संतुलन खोना आर्थिक दुर्घटना का प्रमुख कारण है। अतः निश्चित आर्थिक समृद्धि हेतु अर्थव्यवस्था का निरन्तर संतुलन बनाए रखना आवश्यक हैं जब हम सायकिल, मोटर सायकिल, कार, बस, हवाई जहाज या मेलों में लगने वाले चर्खी एवं झूलों पर सवार होते हैं तो अपना संतुलन निरन्तर बनाए रखते हैं और मनोवांछित लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था पर भी निरन्तर संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यह बात शायद बहुत कम लोगों की समझ में आती है और वे लोग स्थायी आर्थिक स्थिति वाली मुँगेरी लाल के हसीन सपनों में खोए रहते हैं। जब तेल के कुएँ, कोयले एवं सोने की खानें भी अनवरत काल तक पेट्रो रसायन एवं मूल्यवान अयस्कों का उत्पादन नहीं कर सकती तो कोई भी व्यवसाय या साधन अनवरत आर्थिक स्थिरता कैसे प्रदान कर सकता है? अपेक्षाकृत बड़े गतिमान साधनों जैसे पानी के जहाज, रेलगाड़ी इत्यादि में मोटर सायकिल, कार की अपेक्षा कम संतुलन की आवश्कता होती है, निरन्तरता की भी अपेक्षाकृत कम आवश्यकता पड़ती है, परन्तु संतुलन बनाए रखने की जरूरत खत्म नहीं होती। दरअसल विशाल साधनों में झटके अपेक्षाकृत कम महसूस होते हैं, परन्तु खतरा भी बड़ा होता है। ठीक उसी प्रकार बड़ी एवं मजबूत अर्थव्यवस्था में झटका कम महसूस होता है और सामान्य व्यक्ति को यह भ्रम हो जाता है कि इसमें निरन्तर संतुलन की आवश्यकता नहीं होती। यह अपने आप चलती रहती है और लाभी भी देती रहती है। इसके मालिकान सिर्फ ऐशो-आराम करते हैं, परन्तु यह कतई सत्य नहीं है, मात्र एक भ्रम है। बड़ी सामान्य सी बात है कि जब बाग की खुबसूरती बनाए रखने के लिए निरन्तर निराई-गुड़ाई, एक मकान के लिए निरन्तर रंगाई, सफाई, पोछाई, एक शरीर की खुबसूरती के लिए निरन्तर सफाई, कसरत, योग, ध्यान की आवश्यकता पड़ती है तो एक स्थायी अर्थव्यवस्था हेतु भी निरन्तर प्रयास की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ेगी? सार्वभौम सत्य यह है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही चलायमान है। पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, चाँद-तारे सभी गतिमान हैं और इन्हीं के साथ-साथ सम्पूर्ण जीव-जन्तु भी चलायमान हैं। चूँकि ये ग्रह बहुत विशाल है, अतः इनकी गति महसूस नहीं होती, परन्तु सत्य तो चलायमान ही है। अतः इन ग्रहवासियों को जीवन-यापन के लिए निरन्तर संतुलन की आवश्यकता पड़ती है। जो संतुलन खो देते हैं उनकी पूरी प्रजाति ही नष्ट हो जाती है। जब प्रकृति का यही स्वरूप है तो ऐसे में अर्थव्यवस्था इससे अछूती कैसे रह सकती है? अतः निरन्तर आय वृद्धि अपरिहार्य है। इसका कोई विकल्प नहीं है। आर्थिक सुदृढ़ता हेतु बौद्ध धर्म में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सुझाव का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अथवा परिवार में अपनी मासिक या दैनिक आय को पाँच वर्गों में विभक्त करना चाहिए और इन पाँचों भागों का उपभोग निम्नलिखित पाँच मदों में ही करना चाहिए। किसी भी अवस्था में मदों का स्थानान्तरण नहीं करना चाहिए। 1. प्रथम मद - शिक्षा पर व्यय 2. द्वितीय मद - धर्म पर व्यय 3. तृतीय मद - सामाजिक / सांस्कृतिक व्यय 4. चतुर्थ मद - दैनिक उपभोग पर व्यय 5. पंचम मद - भविष्य योजना पर व्यय। उपर्युक्त तथ्यों के साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि सामाजिक/सांस्कृतिक कार्यों में व्यय सदैव अपनी बचत (बजट) के अनुसार करना चाहिए। कोई भी दान-न्यौता अपनी हैसियत के अनुसार देना चाहिए न कि मेजबान की हैसियत के आधार पर। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न मदों का अनुपात बढ़ाया या घटाया जा सकता है परन्तु हर हाल में शिक्षा का बजट सर्वाधिक रखना चाहिए। मैंने उपर्युक्त तथ्यों का कुछ वर्षों से अनुपालन करना शुरु किया और आज मैं अपनी आय से अपने आप को संतुष्ट पाती हूँ जबकि आज के कुछ वर्ष पूर्व मैं लगभग इतनी ही आय के बावजूद सर्वदा तंगहाल एवं परेशान रहती थी। इस आर्थिक मंत्र ने मेरे जीवन में काफी संतुष्टि का समावेश किया है और आज मैं काफी कुछ भविष्य की योजनाओं की तरफ से भी निश्चिन्तता महसूस करती हूँ। मेरे विचार से प्रत्येक व्यक्ति को इस अद्भुत मंत्र को आजमाने की कोशिश करनी चाहिए।
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Posted On:  06/Dec/2016
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
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Article Title:  वर्तमान आर्थिक परिदृश्य और मूल्य निर्धारण

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Article Content:  वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में महँगाई, कालाबाजारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, हड़प, गबन एवं घोटालों से बाजार गर्म है। आए दिन भ्रष्टाचार एवं गबन की खबरें सुर्खियाँ बन रही हैं। लूट-खसोट एवं हत्याओं का भी बाजार गर्म है। यहाँ तक कि अपराधी महिलाओं और बच्चों को भी नहीं छोड़ रहे हैं। चेन स्नैचिंग और किडनैपिंग आम बात हो गयी है। जहाँ महानगर इन घटनाओं से अत्यधिक प्रभावित है वहीं कसबों में सूदखोरी, अवैध बैनामा, जमीनों-मकानों को हड़पना आम बात हो गयी है। एक ही जमीन या मकान कई-कई बार बेच और खरीद ली जा रही है। मिलावट आम बात हो गयी है, यहाँ तक कि जहर भी शुद्ध पाए जाने की संभावना कम ही है। मिलावट तक में तो फिर भी गनीमत थी, अब तो मामला उससे भी कई गुना आगे निकल चुका है। अब कृत्रिम सामान जैसे पेन्ट से बने दूध, एसिड से धुली और रंग-रोगन की गयी सब्जियाँ आम हो चुकी हैं। इन्जेक्शन देकर ज्यादा से ज्यादा दूध पैदा करना एवं सब्जियों को रात भर में ही कई किलो का बढ़ा देना आम बात हो गयी है। कुल मिलाकर चारों तरफ लूट-खसोट का बोलबाला है। फर्क बस इतना है कि कोई गन प्वाइंट पर तो कोई कुर्सी-मेज लगाकर, कोई सूट-बूट में तो कोई खादी में लूट रहा है। शिक्षा, स्वास्थय, शान्ति, पौरुष, धर्म, भूत-भविष्य इत्यादि के नाम पर भी लूट-खसोट का ही बोलबाला है। इतिहास की सार्थकता यही है कि जब भी कोई विशिष्ट परिस्थिति पैदा हो, उस परिस्थिति विशेष में लागू उन नीतियों की समीक्षा शुरु की जाए, जिन नीतियों ने उस परिस्थिति विशेष को सफलतापूर्वक नियंत्रित कर लिया हो। अगर भारतीय इतिहास का अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट है कि ऐसी ही परिस्थितियाँ ............... शताब्दी में भयानक रूप में उपस्थित थीं। उस समय भारत में खिलजी वंश का शासन था। इन चुनौतियों के समाधान के लिए तत्कालीन शासक अलाउद्दीन खिलजी ने मूल्य निर्धारण की नीति बनायी और उसे सख्ती से लागू कर इस चुनौती का समूल नष्ट कर दिया। अर्थात महँगाई, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, सूदखोरी, मिलावटखोरी इत्यादि पर प्रभावशाली अंकुश लगा दिया और अमन-चैन स्थापित कर दिया। अलाउद्दीन खिलजी भारतीय इतिहास में अपनी सफल नीतियों की वजह से हमेशा याद किये जाएँगे। हमारी समस्या यह है कि हम नीतियों के मूल्यांकन की बजाय नीति-निर्धारक की जाति-धर्म का मूल्यांकन ज्यादा करते हैं जिसकी वजह से समस्याएँ गम्भीर ही होती हैं। अतः वर्तमान आवश्यकता यह है कि हम इतिहास के पन्नों को पलटकर वर्तमान परिस्थितियों एवं चुनौतियों की खोज करें एवं उन चुनौतियों-परिस्थितियों के सापेक्ष सफल नीतियों को चुनकर उनको सख्ती से लागू करने पर विचार करें। वर्तमान नीतियों से यह स्पष्ट है कि कृषि पैदावार, उद्योग पैदावार एवं सेवा क्षेत्र में न तो कोई तारतम्यता है और न ही कोई समानुपातिकता (Rationalisation)। जहाँ पर कृषि पैदावार को मूल्य निर्धारण से बाँध दिया गया है वहीं पर उद्योग पैदावार एवं सेवा क्षेत्र को अपने-अपने मूल्य लागू करने की खुली छूट दे दी गयी है। और कहा यह जा रहा है कि इन क्षेत्रों का मूल्य बाजार निर्धारित करेगा, जब पूरा बाजार ही चन्द पूँजीपतियों के हाथ में है तो बाजार क्या खाक निर्धारित करेगा? नतीजा अमीरों और गरीबों की खाई के रूप में सामने हैं। एक कृषि प्रधान देश में, जिसकी नब्बे प्रतिशत आबादी कृषि उत्पादन पर निर्भर है, उसके हाथ-पाँव बाँध दिये गए हैं और उद्योगपतियों को दोनों हाथों से लूटने की खुली छूट दे दी गयी है। आखिर जब सरकार कृषि उत्पादों गेहूँ, धान, अरहर, ज्वार, बाजरा इत्यादि का समर्थन मूल्य घोषित कर रही है तो औद्योगिक उत्पादों कपड़ा, दवाईयाँ, टी॰वी॰, फ्रिज, मोटर वाहनों, साइकिल, जूता-चप्पल, फोन इत्यादि का समर्थन मूल्य क्यों नहीं घोषित करती। सेवा क्षेत्र में संचार सेवा, यात्रा सेवा, माल ढुलाई, किराया, हजामत, मनोरंजन सेवा, सिनेमा इत्यादि का समर्थन मूल्य क्यों नहीं घोषित किया जाता और अगर सेवा क्षेत्र एवं औद्योगिक उत्पादों का समर्थन मूल्य नहीं घोषित कर सकते तो कृषि क्षेत्र के उत्पादों के मूल्यों को क्यों बाँध दिया जाता है, उसे भी बाजार पर क्यों नहीं छोड़ दिया जाता। आखिर ऋतिक रोशन की एक फिल्म का पारिश्रमिक 50 करोड़ रुपये और एक स्पॉटमैन का पारिश्रमिक 500 रुपये रोज क्यों होना चाहिए? वह गलत नीतियों का दुष्परिणाम है और इसकी मूल वजह है सिनेमा के टिकटों के मूल्य का निर्धारित न होना अन्यथा स्पॉटमैन और हीरो के पारिश्रमिक में समानुपातिकता अवश्य होती। कृषि उत्पाद मूल्य, उद्योग उत्पाद मूल्य एवं सेवा मूल्य का सबसे सटीक उदाहरण आलू और चिप्स, टमाटर और सॉस इत्यादि के मूल्यों से स्पष्ट होता है। उत्पादन के समय आलू किसान से दो से चार रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा जाता है। उसके बाद पूँजीपतियों द्वारा उसका औद्योगिक इकाइयों द्वारा चिप्स बनाकर दो सौ रुपया प्रति किलो की दर से बाजार में बेचा जाता है। अब प्रश्न यह उठता है कि दो रुपया प्रति किलो की दर का कृषि उत्पाद से दो सौ रुपये प्रति किलो के औद्योगिक उत्पाद में कैसे परिवर्तित हो जाता है? क्या इन दोनों दरों में कोई समानुपातिकता है? दरअसल इस दो सौ रुपये के चिप्स के मूल्य में किसी सिने तारिका या विश्वसुन्दरी के अधनंगे जिस्म एवं मनमोहक अदा का सेवा मूल्य भी समाहित है जो लगभग दस से बीस लाख तक प्रति दस सेकेण्ड का विज्ञापन बनाने हेतु अदा किया जाता है। अब यह बताना मेरी समझ के बाहर की बात है कि दो रुपये, दो सौ रुपये एवं बीस लाख रुपये में क्या समानुपातिकता है, परन्तु जमीनी सच्चाई तो यही है कि ऐसा हो रहा है। कृषि उत्पाद पर सरकारी अंकुश से मूल्य निर्धारित किया गया है और औद्योगिक उत्पाद एवं सेवा मूल्य को बाजार पर छोड़ दिया गया है। अब वही कृषि आधारित बहुसंख्य आबादी एक क्विंटल आलू बेचकर एक किलो चिप्स खरीदने को बाध्य है, हाँ उसमें चटखारे के लिए सिने तारिका के जिस्म की सुगन्ध और नमकीनियत जरूर शामिल हो गयी है जो किसान के बदसूरत बदन की दुर्गन्धयुक्त पसीने को खत्म कर चुकी है। कुछ इसी तरह की हकीकत टमाटर और सॉस, गेहूँ और हॉर्लिक्स, गेहूँ और बिस्किट, धान और चावल, मक्का और केलॉक्स, सेव और सेव के जूस, एलोवेरा और ऐलोवेरा जूस इत्यादि की भी है। अतः वर्तमान परिदृश्य तो यही कह रहा है कि खिलजी की मूल्य निर्धारण की नीति का लागू होना ही वर्तमान समय की माँग है। बोतलबन्द शुद्ध पेयजल एवं पशु उत्पाद दूध के मूल्य का अध्ययन की कुछ अजीब ही कहानी कहता है। हालाँकि दोनों का बाजार भाव लगभग समान ही है परन्तु दोनों के उत्पादन खर्च में जमीन-आसमान का अन्तर है। दूध की पौष्टिकता एवं पानी की पौष्टिकता की तुलना का कोई औचित्य नहीं बनता और न ही उनके संरक्षण खर्च की तुलना का कोई औचित्य है, क्योंकि बाजार की नजर में इसका कोई मोल नहीं है। अब उत्पादन खर्च पर नजर डालने से यह स्पष्ट होता है कि लगभग पन्द्रह से बीस हजार में एक पानी छानने की मशीन, लगभग पच्चीस सौ बिजली का खर्च, मुफ्त का कच्चा पानी एवं लगभग बहत्तर हजार रुपये सालाना व्यक्ति की मजदूरी, यानी कुल मिलाकर कुल सालाना लागत एक लाख रुपये वार्षिक जिसमें प्रत्येक दो हजार लीटर पर कैण्डिल बदलने का खर्च भी सम्मिलित है। सालाना उत्पाद बाजार की माँग पर न्यूनतम बीस हजार लीटर। उत्पाद से सालाना आय लगभग चार लाख प्रथम वर्ष, बचत तीन लाख रुपये, तदुपरान्त चार लाख वार्षिक दस वर्षों तक न्यूनतम। इसके ठीक विपरीत दुग्ध उत्पादन पर वार्षिक खर्च- पचास हजार की गाय या भैंस, बहत्तर हजार की मजदूरी, छत्तीस हजार का दाना, पन्द्रह हजार का भूसा, दस हजार की दवाई। कुल सालाना खर्च लगभग दो लाख रुपये वार्षिक, इसमें बीमारी एवं दुर्घटना की गणना नहीं शामिल है, वार्षिक उत्पादन लगभग दो हजार लीटर दूध से आय लगभग साठ हजार रुपये प्रथम वर्ष, अगले वर्ष का खर्च लगभग डेढ़ लाख रुपये वार्षिक एवं आय साठ हजार रुपये वार्षिक। वार्षिक घाटा प्रथम वर्ष एक लाख चालीस हजार एवं तदुपरान्त नब्बे हजार वार्षिक दस वर्षों तक। दोनों उत्पादों के उत्पादन खर्च एवं बाजार भाव से यह स्पष्ट है कि बाजार भाव और उत्पादन खर्च में समानुपातिकता का पूर्णतया अभाव है। या तो किसी भी हाल में पानी पाँच रुपये लीटर से अधिक नहीं बिकना चाहिए अथवा दूध की कीमत चार सौ रुपये प्रतिलीटर से कम नहीं होना चाहिए। तब कहीं जाकर समानुपात का नियम लागू हो पाएगा। यह एक विडम्बना ही है कि हमारी नीतियाँ इनको क्यों और कैसे नजरअन्दाज कर रही हैं। लागत या उपज मूल्य के निर्धारण में हमारे किसान उद्यमियों, व्यवसायियों के सापेक्ष काफी फिसड्डी होते हैं। या यूँ कहें कि किसानों को उपज मूल्य निर्धारित करने ही नहीं आता और वो आढ़तियों एवं सरकार द्वारा बेवकूफ बना दिये जाते हैं। एक उद्योगपति अथवा व्यवसायी अपने लागत मूल्य का निर्धारण करते समय सामान का खरीद मूल्य, दुकान का किराया, दुकान का वार्षिक मरम्मत शुल्क, बिजली का बिल, बिजली के उपकरणों का खर्चा, साफ-सफाई का खर्च, गोदाम का किराया, ट्रान्सपोर्टेशन शुल्क के अतिरिक्त कर्मचारियों एवं स्वयं का मासिक वेतन, ग्राहकों के चाय-नाश्ते, आवभगत का खर्च, दुकान के प्रचार का खर्च के अलावा अपना लाभांश जोड़कर विक्रयमूल्य निर्धारित करता है। जबकि कृषक अपने उत्पाद का मूल्य निर्धारित करने में न तो खेत का वार्षिक किराया जोड़ता है, न वार्षिक लगान, न स्वयं की मजदूरी, न भण्डारण स्थल का किराया, न परिवार के अन्य सदस्यों का पारिश्रमिक, न खेत की निगरानी-रखवाली की मजदूरी, न कृषि कार्य हेतु पाले गए जानवरों का खर्च और न ही निराई-गुड़ाई का खर्च। कृषक मात्र बीज का मूल्य और एक-आध रुपये भी अधिक के प्रस्ताव पर खुशी-खुशी बेच देता है। उपर्युक्त तथ्य किसानों के लगातार पिछड़ने एवं व्यवसायियों के लगातार उन्नति के कारणों को स्पष्ट करते हैं। सारांश रूप में भारत का आर्थि परिदृश्य काफी भयावह दौर से गुजर रहा है। कृषक दोहरी मार खाने को विवश हैं तो उद्योगपतियों एवं व्यवसायियों के दोनों हाथ में घी है। सरकारी नीतियों ने जहाँ कृषकों को जकड़कर रखा है वहीं उद्योगपतियों को लूट की खुली छूट दे रखी है। किसान अपने उत्पाद का लागत मूल्य निर्धारित करने में न तो सक्षम है और न ही स्वतंत्र। ऊपर से आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में समानुपातिकता का अभाव कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। सरकारी नीतियाँ कृषक विरोधी ही दिख रही हैं। कुल मिलाकर कालाबाजारी, जमावटखोरी, मिलावटखोरी, भ्रष्टाचार एवं घोटालों का बाजार गर्म है। अर्थात ठीक वही परिस्थितियाँ पैदा हो गयी हैं जिन परिस्थितियों में अलाउद्दीन खिलजी ने मूल्य निर्धारण की नीतियाँ लागू की थीं। अतः इतिहास से सबक लेकर तत्काल मूल्य निर्धारण की नीतियों का लागू किया जाना अतिआवश्यक है जिससे सीधे-सादे किसान दोहरी मार से बच सकें। अन्यथा धर्म या जातीय शगूफे बहुत दिनों तक आवाम को बेवकूफ नहीं बना सकते। अतः तत्काल सार्थक पहल की जरूरत है।
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Posted On:  06/Dec/2016
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
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Everette:Says Enter your PIN http://blog.cilek.com/etiket/trendler/ tadalista time Ryan James Yezak , director of "Second Class Citizens," a film that examines discrimination based on sexual orientation, and others organized the gay blood drive to protest a U.S. Food and Drug Administration rule that has prohibited gay and bisexual men from donating blood since 1977.
ON: 05/11/18
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ON: 05/11/18
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ON: 05/11/18
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ON: 05/11/18
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ON: 05/11/18
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