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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

HEALTH
 
Article Title:  मस्तिश्क ज्वर ‘‘पूर्वांचल की महामारी’’ (एन्सेफलाइटिस)

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Article Content:  मस्तिश्क ज्वर एक विशाणुजनिक संक्रामक रोग है। पिछले 20 वर्शों मंे इस रोग से लाखों लोग मारे जा चुके है अथवा दृश्टिहीनता, वहरापन, लकवा, गर्दन की अकड़न, स्मृतिहीनता इत्यादि के षिकार हो चुके है। इसका प्रभाव क्षेत्र उत्तर प्रदेष का पूर्वांचल एवं पष्चिमी बिहार रहा है। प्रत्येक वर्श मानसून के समय से लेकर जाड़े (जनवरी, फरवरी) तक इस रोग की चपेट में हजारो लोग आते है और इसके संक्रमण में समय इतना कम लगता है कि अधिकांष लोग काल के गाल मंे समाहित हो जाते है। षुरूआती दौर में मरीज को उल्टी, बुखार, सिर दर्द, उत्तेजना एवं गर्दन मंे अकड़न होती है संक्रमण अधिक होने पर मरीज को वेहोषी, मिर्गी, लकवा इत्यादि की षिकायत हो जाती है। मस्तिश्क ज्वर मुख्यतः हरपीज, अरबो, मिजिल्स, मम्स और रूवेला जैसे विशाणुओं के संक्रमण द्वारा व्यक्ति के षरीर में प्रवेष करता है। इसके मुख्य संवाहक दूशित पेयजल एवं मच्छर है। वर्तमान मंे इसका इलाज मस्तिश्क का सूजन कम करने के लिये मैनीटोल या लौरिक्स द्वारा एवं संक्रमण नियंत्रित करने हेतु एण्टी वायरल मेडिसीन मुख्यतः एसाॅथक्लोवीर द्वारा किया जाता है। (साभार हिन्दुस्तान 31 अगस्त) उपर्युक्त तथ्य मुख्यतः दो बाते स्पश्ट करते है प्रथम कि मस्तिश्क ज्वर का प्रभाव मुख्यतः तराई क्षेत्रों में ही अधिक है एवं मानसून के समय ही अथवा जब तक जल जमाव प्रभावी रहता है तभी तक मुख्यतः प्रभावी रहता है। दूसरा मच्छरों की अधिकता एंव दूशित पेयजल की समस्या भी इसी समय तराई क्षेत्रों में अधिक प्रभावी रहती है। अब तक मस्तिश्क ज्वर की रोकथाम हेतु हुये प्रयासो पर अगर ध्यान दिया जाय तो यह स्पश्ट है कि अब तक इस रोग की रोकथाम हेतु कोई सार्थक प्रयाष नही षुरू हो पाया है। संक्रमण हो जाने के बाद की दवाइयाॅ तो उपलब्ध है और इलाज भी हो रहा है परन्तु इसका बचाव हेतु कोई लम्बे समय की कार्ययोजना पर कार्य नही षुरू हो पाया है। अब तक यही कहा जाता रहा है कि मच्छरों के काटने से बचा जाय अथवा बच्चों को नियमित रूप से चिकेन पाक्स, मिजिल्स, मम्स, रूवेला से बचाव के टीके लगावायें जाॅय परन्तु प्रौढ़ो एवं वुजुर्गों हेतु कोई कार्ययोजना दृश्टिगोचर नही होती। इस समय भी उत्तर प्रदेष का गोरखपुर मण्डल इस रोग से बुरी तरह प्रभावित है सैकड़ो लोगों को संक्रमण हो चुका है एवं कुछ लोग मारे भी जा चुके है। कुछ सामान्य से रहन-सहन एवं खान पान में परिवर्तन द्वारा संक्रमण को रोकने का सुझाव दिया जा रहा है। जिसके द्वारा इस रोग को इस धरती से हमेषा के लिए मिटाया जा सकता है। बष सार्थक पहल की आवष्यकता है। एक अंग्रेज वैज्ञानिक आसाम में मच्छरांे की रोकथाम हेतु आस्टेªलिया से गम्पू और गम्पूसियां नामक दो मछलियों को लाकर जलाषयों में छोड़ा था। जो मच्छरों के लाबी को ही खाती है जिससे मच्छर पैदा ही नही होने पाते। वर्तमान में हम इनको गरई (गम्पू) एवं मंगूरी (गम्पूसिया) नाम से जानते है। ये मछलियां मानसून के समय में ही अण्डे देती है और हर गडढ़े, तालाब, नदी, नाले, धान के खेत इत्यादि में दिखने लगती है। यहाॅ तक कि नावदानों में भी पायी जाती है और किसी भी प्रकार के संक्रमण से प्रभावित नही होती। समस्या यह है कि हमारा समाज सबको मार कर खा जाता है। हर गाॅव में इनका षिकार युद्ध स्तर पर षुरू हो जाता है और हम सबका भक्षण कर जाते है जिससे मच्छरों की उत्पत्ति भयावह रूप में होने लगती है। अतः यदि किसी तरह इनका षिकार रूक जाय तो मच्छरों की उत्पत्ति पर प्रभवी रोक लगाया जा सकता है और इन्सेफलाइटिस मलेरिया इत्यादि की रोका या कम किया जा सकता है। जरूरत है तो बस दृढ़ इच्छा षक्ति की। मेरे ख्याल से रोटरी, रोट्रेक्ट, इनरव्हील जैसे सामाजिक संगठनों एवं हिन्दु युवा वाहिनी जैसी युवाषक्ति यदि जन जागरूकता का सिर्फ एक वर्श ब्रत ले ले तो तमाम जन मानस मच्छरों के देष एवं मच्छर जनित रोगो से हमेषा के लिये झुटकारा पा सकता है। ये मछलियों मनुश्यों की सहयोगी ही नही परन्तु उपयोगी भी है और प्रत्येक धार्मिक, सामाजिक संगठनों को जनमानस की रक्षा हेतु आगे आना चाहिये। इसके अतिरिक्त नगर पालिकाओं, नगर पंचायतों, ग्राम पंचायतों की भी जगह-जगह नालियों में जालीदार टैंक बनवाकर इनको पालना चाहिये। ये दूशित से दूशित जल मंे भी जिन्दा रह सकती है और मच्छरों पर प्रभावी अंकुष लगा सकती है। जरूरत है तो बस दृढ़ इच्छा षक्ति की एवं धार्मिक एवं सामाजिक जागरूकता की। वरसात से लेकर जाड़े तक वातावरण मंे वैक्ट्रिया एवं विशाणुओं की अधिकता रहती है। विभिन्न घातक जीवाणु एवं विषाणु भूमि, भवन, मिट्टी, वर्तन, चादर, पानी इत्यादि में फैले रहते है जो हमारा स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित करते है। संक्रामक रोगों का आक्रमण जनमानस पर होता रहता है और हम अपनों को खोेते चले जाते है। प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नीम मंे यह नैसर्गिक गुण होता है कि वह इन जीवाणुओं और विशाणुओं को मार डालता है और संक्रमण पैदा ही नही होने देतां जिस जमीन पर दरवाजे पर या आंगन में नीम के पेड़ की पत्तियां या बीज गिरता रहता है वहां रहने वाले लोग अपेक्षाकृत संक्रामक रोगो की चपेट मंे कम ही आते है। अतः यदि सामाजिक संगठन गाॅवों को गोद लेकर प्रत्येक घर के दरवाजे या आंगन में नीम का पेड़ लगवा दे तो वह गांव या कस्वा संक्रामक रोगों से लगभग मुक्त हो सकता है जहाॅ भी नीम की पत्तियां गिरेगी वह जमीन वह नाली, वह घर वहाॅ का पेय जल काफी हद तक जीवाणुओं एवं विशाणुओं से मुक्त हो जायेगा। नीम का हर भाग जैसे पता, बीज, दातून जनमानस हेतु अत्यन्त उपयोगी है। तराई क्षेत्र मंे रहने वाले अधिकांष लोग सावन से लेकर नव रात्रि तक माॅस मछली के साथ-साथ गर्म मसालो का भी सेवन छोड़ देते है। इन क्षेत्रों में गर्म मसालो का प्रयोग अधिकांष माॅस और मछली पकाने मंे ही किया जाता है, सामान्य रूप में साधारण मसालो का ही प्रयोग किया जाता है जबकि गर्म मसाले अधिकाषं आर्युवेदिक औशधियाॅ है। ज्यादातर आर्युवेदिक औशधियां इन्ही के मिश्रण से तैयार की जाती है। इसके अतिरिक्त अधिकांष तराई के लोगो में यह भ्रान्ति पायी जाती है कि मसालों के सेवन से ही उनका पेट खराब हो जाता है जबकि अधिकांष मामलों मंे इस मौसम में दूशित पेय जल की वजह से पेट खराब होता है और लोग समझते है कि मसाले से पेट खराब हो गया। हलाकि अत्यधिक मसाले के सेवन से बचना चाहिये परन्तु आवष्यकतानुसार गर्म मसालों का सेवन तराई क्षेत्रों में इस मौसम में आवष्यक है। क्यांेकि मानसून से लेकर जाड़े तक भूमिगत जल स्तर काफी उपर रहता है और पेयजल संक्रमित हो जाता है और संक्रामक रोगों की संभावना बलवती हो जाती है। गर्म मसाले काफी हद तक जीवाणुओं एवं विशाणुओं द्वारा पैदा संक्रमण को रोकने में सक्षम होते है। अतः इनके मानसून के समय उचित अनुपात में सेवन की वैज्ञानिक विष्लेशण की आवष्यकता है। गेंदे के फूल और पत्तों एवं तुलसी के पौधो मंे क्रमषः मच्छरों को मारने एवं संक्रमण रोकने की क्षमता पायी जाती है। नाबदानों के किनारे गाॅवों में गेंदे के फूल लगाकर मच्छरों की पैदावार पर अंकुष लगाया जा सकता है साथ-ही सुन्दरीकरण का कार्य भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त गाॅव या कस्बे के प्रत्येक आगन में गेंदे एवं तुलसी का पौधा लगाकर संक्रामक रोगो पर अंकुष लगाया जा सकता है। विभिन्न सामाजिक संगठनों को इसका सर्वप्रथम विष्लेशण करना चाहिये एवं यदि प्रयोगिक लगे तो जन जागरण चलाकर इसका प्रचार प्रसार कर लोगो को अपने आंगन मंे एवं दरवाजों पर तुलसी एवं गेंदे के फूल लगाने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिये। यदि संभव हो तो प्रायोगिक तौर पर एक किसी गाॅव की चिन्हित कर प्रत्येक घर हेतु एक तुलसी एवं एक गेंदे का पौधा उपहार स्वरूप देकर उसका लगवाना सुनिष्चित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य भी वहुत सारे छोटे-मोटे प्राकृतिक साधनों की जानकारी प्राप्त कर उसका प्रचार-प्रसाद विभिन्न संगठनों द्वारा किया जा सकता है और अपनी मातृभूमि को संक्रामक रोगो से मुक्त रखा जा सकता है।
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Posted On:  16/Mar/2017
Auther Name:  -सुमन वी0 आनन्द
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Article Title:  प्रोजेरिया

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Article Content:  प्रोजेरिया एक जेनेटिक अनियमितता का रोग है जिसमें जीवों के शरीर में तीव्र गति से उम्र बढ़ने के लक्षण दिखने लगते हैं। इस रोग में शरीर के बाह्य व आन्तरिक दोनों प्रकार के अंगों में उम्र बढ़ने के प्रभाव परिलच्छित होते हैं और अल्प समय में ही अपना जीवन चक्र पूर्ण कर मृत हो जाता है। प्रोजेरिया से प्रभावित जीवन की स्थिति बहुत असामान्य होती है। सन्तोषजनक बात सिर्फ यह है कि बहुत ही कम जीव इससे प्रभावित होते हैं। जैसा कि ‘‘इन्वायरमेन्टल’’ साईट के अन्तर्गत उपस्थित लेख ‘‘तेरह के अंक से जुड़ी हमारी प्रकृति एवं जीवन का रहस्य’’ शीर्षक में वर्णित है कि पूरी कायनात 13 से प्रभावित है और सभी जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों का जीवन चक्र तेरह की आवृति से प्रभावित होता है। मनुष्य का जीवन भी पूर्णतया 13 की आवृत्ति से प्रभावित होता है और मनुष्य में सभी महत्वपूर्ण परिवर्तन तेरह वर्ष बाद होते हैं। अर्थात मनुष्य में सभी शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन प्रत्येक 13 वर्ष के आवृत्ति में परिलच्छित होते हैं और मनुष्य इस आवृत्ति के तेरह आयाम पूर्ण कर कर अपना जीवन चक्र पूर्ण कर लेता है। मनुष्य में प्रत्येक 13 वर्ष उपरान्त एक परिवर्तन होता है और यह परिवर्तन 13 बार सम्पन्न होने पर मनुष्य की प्राकृतिक उम्र पूर्ण हो जाती है अर्थात मनुष्य की अधिकतम उम्र 169 वर्ष की होती है। प्रोजेरिया प्रभावित मनुष्य की मृत्यु अधिकांश मामलों में 10 से 15 वर्ष के बीच एवं कुछ-कुछ मामलों में 25 से 30 वर्ष के बीच पायी गयी है। अब तक प्राप्त आँकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि प्रोजेरिया प्रभावित मनुष्य की अधिकतम उम्र लगभग 25 तक ही रही है। अगर प्रोजेरिया का प्रभाव एवं मनुष्य की उम्र पर 13 के प्रभाव पर सम्यक अध्ययन करें तो यह स्पष्ट होता है कि जिन प्रोजेरिया प्रभावित मनुष्यों में शारीरिक परिवर्तन की आवृत्ति 13 वर्ष की बजाय एक ही वर्ष में होने लगेगी, उनका जीवनकाल 169 वर्ष की बजाय 13 वर्षों में ही पूर्ण हो जायेगा और जिन प्रोजेरिया रोगियों के शारीरिक परिवर्तन की आवृत्ति प्रत्येक दूसरे वर्ष होगी, उनका जीवनकाल 26 वर्ष से अधिक नहीं होगा। अर्थात अगर जेनेटिक परिवर्तन प्रत्येक वर्ष होंगे अथवा प्रत्येक दो वर्ष पर होंगे, उनकी अधिकतम उम्र 13 अथवा 26 वर्ष से अधिक नहीं हो सकती। प्रोजेरिया के अधिकांश मामले में प्रायः जीवनकाल 13 वर्ष से कम ही पाया गया है। प्रोजेरिया से संबंधित उपर्युक्त आँकड़ों के अतिरिक्त अन्य कुछ मुझे प्राप्त नहीं हो सका। मेरी चिन्ता का विषय यह है कि प्रत्येक 3, 4, 5 या 6 वर्ष में होने वाले जेनेटिक परिवर्तन से ग्रसित प्रोजेरिया रोगियों की क्या स्थिति है? क्या उनकी मृत्यु को सामान्य मृत्यु मान लिया जाता है? क्योंकि प्रत्येक 3 वर्ष में जेनेटिक परिवर्तन प्रभावित रोगी की मृत्यु 39 साल में होगी एवं प्रत्येक 5 वर्ष में परिवर्तित होने वाले रोगी की मृत्यु 65 वर्ष के आस-पास होगी, तो क्या इन रोगियों को प्रोजेरिया प्रभावित रोगियों की श्रेणी में न रखकर सामान्य रोगियों की श्रेणी में रखा जाता है? अगर यही स्थिति है तो प्रोजेरिया का वास्तविक आँकड़ा जन-सामान्य के लिए उपलब्ध नहीं कराया गया है और इसका वास्तविक भयावह रूप एवं आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, या तो इस पर पूर्ण वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता है, या अगर शोध हो चुकी है तो वास्तविक आँकड़ा जन-सामान्य के सामने लाने की आवश्यकता है। यह जरूरी नहीं है कि प्रोजेरिया प्रभावित मनुष्य में जेनेटिक परिवर्तन 1 या 2 वर्ष की उम्र से ही शुरू हो जाए। ऐसे भी मामले हो सकते हैं कि मनुष्य ने 40 या 50 वर्ष की उम्र सामान्य रूप से पूरा किया हो तथा 41वें, 42वें अथवा 51वें, 52वें वर्ष की उम्र में प्रोजेरिया से ग्रसित हो गया हो। ऐसे रोगियों की मृत्यु 53 वर्ष अथवा 63 वर्ष की उम्र में होगी, तो ऐसे प्रोजेरिया रोगियों की क्या स्थिति है? क्या इनकी मृत्यु को सामान्य मृत्यु माना जाता है? अगर 40 वर्ष तक सामान्य जीवन जीने वाले मनुष्य में जेनेटिक परिवर्तन प्रत्येक वर्ष होने लगते हैं तो यह भी तो एक प्रोजेरिया का ही मामला है। क्या ऐसे मामलों पर कोई शोध-पत्र उपलब्ध है या ऐसे रोगियों का कोई आँकड़ा किसी भी देश के पास उपलब्ध है? मेरे विचार से प्रोजेरिया पर पुनः एक बार सम्पूर्ण शोध की आवश्यकता है और इस शोध एवं वास्तविक आँकड़ों को जनमानस के समक्ष उपलब्ध कराने की ईमानदार पहल की भी आवश्यकता है।
Article Subject: 
Posted On:  15/Mar/2017
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
Article ID: 
12
 
COMMENTS:
 
Lorenzo  Says : Could I ask who's calling? https://matrixglobal.net.id levitra Consumers who like to own the latest gadgets have been frustrated with this approach because it makes them wait at least 2 years for an upgrade. Carriers have recently been allowing upgrades less frequently in order to save on the subsidies, which tend to hurt their profit margins.
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