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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

Psycalogical
 
Article Title:  देव और दानव

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Article Content:  देव और दानव मानव प्रवृत्ति की स्थितियाॅं हैं और यह व्यक्ति के दृष्टिकोण द्वारा निर्धारित होती हैं। समाज मानवों को उनकी प्रकृति एवं प्रवृत्ति के आधार पर देवता से लेकर दानव तक वर्गीकृत करता है। मूलतः यह व्यक्ति की स्वयं की सोच अथवा दृष्टिकोण ;अपेपवदद्ध द्वारा निर्धारित होती हैं। जहाॅं दृष्टिकोण के खुलेपन की सीमा ;ठतवंकदमेेद्ध व्यक्ति को समाज मे देवता का स्थान दिलाती है वही उसका संकुचित दायरा ;छंततवूदमेेद्ध उसे दानव के स्थान पर धकेल देता है। अतः एक सभ्य एवं प्रगतिवादी समाज की स्थापना हेतु यह आवष्यक है कि उसके आने वाली पीढि.यों के दृष्टिकोण का दायरा ज्यादा से ज्यादा खुला हो। संकुचित दृष्टिकोण का समाज न तो प्रयोगवादी हो सकता है और न ही प्रगतिवादी । दृष्टिकोण के खुलेपन के विकाष हेतु षिक्षा व्यवस्था में इसका समायोजन करना आवष्यक है। मेरे हिसाब से तो षिक्षा का मूल उदे्ष्य ही दृष्टिकोण को खुला बनाना ;ॅपकमतद्ध ही आवष्यक होगा। देवता पदस्थापित किये गये महामानवों भगवान बुद्ध भगवान जैन, श्रीराम, श्री कृष्ण, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब , के जीवन शैली एवं योगदान पर दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट होता है कि उपर्युक्त सभी महामानव अपने विषालतम दृष्टिकोण की वजह से देवता के स्थान पर विभिन्न समाजो द्वारा स्थापित किये गये । उनका दृष्टिकोण न सिर्फ मानव मात्र वल्कि समस्त चर चराचर जगत यानि पशु- पक्षी, वनस्पतियाॅं, कीड़े - मकोड़े तक के संवर्धन एवं संरक्षण पर समान विचार रखता था। और जीवन पर्यन्त उन्होने उनके संरक्षण एवं विकाष पर अपने उपदेष दिये। वे सभी जितने संवेदनषील मानव कल्याण के लिये थे, उतने ही संवेदनषील वे विभिन्न वनस्पतियों, पशुओं, पक्षियों, जलचरों, कीड़े - मकोड़ों इत्यादि के लिये भी थे। अर्थात वे समस्त जीवधारियों के कल्याण का वृहद् दृष्टिकोण रखते थे । सारांष रूप में यह कहा जा सकता है कि उपर्युक्त सभी महामानवों का दृष्टिकोण पूर्णतः प्रकृति संरक्षणवादी था। उनके अनुसार जो भी चीज प्रकृति द्वारा पैदा हुई है उसका पूर्णतः संरक्षण होना चाहिये, उसको नष्ट करने का अधिकार किसी अन्य जीवधारी को नही होना चाहिये। समाज ने देवताओं के वाद ऋषि - महर्षि का स्थान सृजित किया एवं उन महामानवों को यह गौरव दिया जिन्होनें मानव कल्याण के लिए जीवन पर्यन्त कार्य किया। वैसे तो यह श्रृॅंखला बहुत लम्बी है परन्तु कुछ नामो को उद्द्यृत करना भी आवष्यक है यथा पातंजलि, श्रृॅगी ऋषि, जमदाग्नि, विष्वामित्र, गोरखनाथ इत्यादि। अगर इनके जीवनवृत्त पर ध्यान दिया जाय तो यह स्पष्ट होता है कि समस्त ऋषि महर्षियों का दृष्टिकोण मानव कल्याण तक सीमित था। उन्होने इस बात पर सम्पूर्ण जीवन कार्य किया कि किस प्रकार प्रकृत्ति के जीव - जन्तुओं, वनस्पतियों का उपयोग कर मानवों के लिये सुखी जीवन की आधारभूत संरचना की जाय अथवा खतरनाक जीव - जनतुओं एवं वनस्पतियों से किस प्रकार मानव जीवन को सुरक्षित किया जाय। अर्थात ऋषि - मुनियों के दृष्टिकोण की व्यापकता सीमित थी जिससे वे समाज द्वारा देवताओं की श्रेणी में नही रखे गये । इसके बाद समाज ने महापुरूषों को पदस्थापित किया जैसे काल माक्र्स, लेनिन, मार्टिन लूथर किंग, गाॅंधी, विवेकानन्द, दयानन्द सरस्वती, डाॅ0 अम्बेडकर, मुगावे, कबीर, रविदास, गुरू नानक इत्यादि इन महापुरूषों के जीवनवृत्त के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनके दृष्टिकोण की व्यापकता वैष्विक स्तर पर तो थी परन्तु मानव समाज के एक वर्ग के कल्याण तक ही सीमित थीं। अर्थात वे सभी व्यक्ति जिन्होने वैष्विक स्तर पर दबे, कुचले, मजदूर, जंगली व्यक्तियों के कल्याण एवं उत्थान के लिए जीवन पर्यनत कार्य किया। समाज ने उन्हें महापुरूषों की श्रेणी में पदस्थापित किया। समाज ने दृष्टिकोण की व्यापकता के क्षेत्र के आधार पर क्रमषः देवता, ऋषि- मुनि एवं महापुरूषों को पदस्थापित किया। इसके बाद क्षेत्रीय महापुरूषों एवं जातिय महापुरूषों का भी वर्गीकरण एवं पदस्थापन समाज द्वारा किया जाता रहा है। यह सिलसिला देवराज इन्द्र से लेकर देवर्षि नारद, दानव ऋषि शुक्राचार्य एवं वर्तमान राजनीतिक युग के जातिवादी एवं क्षेत्रवादी महापुरूषों तक आता हैं। अपने गाॅंव, अपने रिष्तेदारों, अपने खून के लोगों ;ठसववक तमसंजपअमेद्ध अपने परिवार, अपनी स्त्री, अपने बच्चों तक की सीमित दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति सामान्य मनुष्यों की श्रेणी में आते हैं। इससे आगे की संकुचित सोच एवं दृष्टिकोण स्वयं की सोच तक जाती है। स्वयं की सोच का दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति ही काफी कुछ सामान्य श्रेणी में ही समाज द्वारा लिया जाता हैं। परन्तु इसके बाद की स्थिति दानव की पराकाष्ठा तक जाती है। जो व्यक्ति अपने स्वयं के स्वार्थ के लिए अन्य मानवों को तकलीफ देने अथवा नष्ट तक कर देने का दृष्टिकोण अथवा नीयति रखता है वह मनुष्य की श्रेणी से लगातार गिरता हुआ दानवों की श्रेणी तक जाता है। दूसरांे मानवों अथवा पशु - पक्षियों, वनस्पतियों के नुकसान अथवा विध्वन्स की व्यापकता उसको क्रमानुसार स्वार्थी, लालची, जानवर, डाकू, चोर, दैत्य से लेकर राक्षस अथवा दानव तक ले जाती है। अपने स्वयं की इच्छापूर्ति हेतु संपूर्ण चराचर जगत का विध्वंस तक कर देने का दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति ही समाज में दानव की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। अर्थात जिस व्यक्ति का दृष्टिकोण इतना सीमित है कि वह अपने स्वार्थ हेतु सम्पूर्ण प्रकृति का भी नाष कर दे वही दानव है।, साराषं रूप में यह कहा जा सकता है कि दृष्टिकोण की व्यापकता जहाॅं मानव को देवता के रूप में पदस्थापित करती है वही दृष्टिकोण की संकीर्णता उसे दानव बना देती हैं। अतः सभ्य समाज की स्थापना हेतु दृष्टिकोण को व्यापक बनानें वाली नीतियों का बनाया जाना अपरिहार्य हैं।
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Posted On:  16/Mar/2017
Auther Name:  सुमन वी0 आन्नद
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Article Title:  पारिवारिक रिश्ते और बाल स्वभाव

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Article Content:  बाल्यकाल सीखने समझने का महत्वपूर्ण समय होता है। बच्चा बाल्यावस्था में ही सभी चीजें सीखता है और इसके आधार पर बनते हैं- पारिवारिक रिश्ते, पारिवारिक आचरण, व्यवहार, खान-पान, संस्कृति और आस-पास का वातावरण। बच्चों का घर के परिवेश में ही दिनचर्या पूरी होती है, अतः उसके सीखने, समझने की शुरुआत भी घर से ही शुरू होती है, बच्चों का घर के परिवेश में ही दिनचर्या पूरी होती है, अतः बाल्यकाल में ही उसके भावी जीवन की बुनियादी मान्यताएँ स्थापित हो जाती हैं। किसी भी व्यक्ति के जीवन के आधार की मात्र जीस प्रतिशत मान्यताएँ ही औपचारिक शिक्षा द्वारा स्थापित होती हैं, शेष सत्तर प्रतिशत मान्यताओं की स्थापना में पारिवारिक रिश्ते, आचरण, संस्कृति, कार्य-व्यवहार, खान-पान, आचरण आदि की भूमिका होती है। पास-पड़ोस के परिवेश का भी योगदान महत्वपूर्ण होता है। किसी भी व्यक्ति का आचरण एवं कार्य-व्यवहार उसके परिवार के पारस्परिक रिश्ते, आचरण, संस्कृति, कार्य-व्यवहार एवं परिवेश का प्रतिबिम्ब होता है। घर एवं पास-पड़ोस के परिवेश के अनुसार ही बच्चों के मन-मस्तिष्क में उसके भावी जीवन की मान्यताएँ स्थापित हो जाती हैं, जो पूरे जीवन भर उसके आचरण और कार्य-व्यवहार द्वारा प्रतिबिम्बित होती रहती हैं। घरेलू परिवेश से निकल कर बच्चे प्राथमिक विद्यालय जाते हैं। सामान्यतया प्राथमिक विद्यालयों में अक्षर-शब्द, वाक्य ज्ञान के उपरान्त आदर्श आचरण, व्यवहार, रिश्ते, आज्ञाकारिता, सम्मान, विश्वास, सहयोग, सहायता, सेवा, कर्म इत्यादि का पाठ पढ़ाया जाता है। राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय महापुरुषों के उदाहरणों द्वारा उपर्युक्त तथ्यों को स्थापित किया जाता है। इस उम्र में बच्चों में जबरदस्त नई-नई चीजों को सीखने एवं समझने की इच्छाशक्ति होती है। बच्चे कभी स्कूली पाठ्य सामग्री एवं शिक्षकों द्वारा बतायी गयी उपर्युक्त आदर्श बातों की तुलना अपने घर-परिवार एवं पास-पड़ोस के परिवेश से करते हैं, तो कभी घर-परिवार अथवा पास-पड़ोस के परिवेश के आचरण व्यवहार को पाठ्यक्रमों में तलासते हैं। अर्थात स्कूलों में पढ़ाई गयी आदर्श बातें जब घर परिवार में प्रचलित बातों से तुलना की जाती है तो दोनों में कोई तालमेल नहीं बैठ पाता। सारे आदर्श व्यवहारिक जीवन की बातों से तालमेल नहीं रखते। बालमन कभी घरेलू ज्ञान को विद्यालय के पाठ्यक्रमों से तलाशता है, तो कभी स्कूली ज्ञान को घर-परिवेश के कार्य व्यवहार में। अर्थात कभी स्कूली ज्ञान की प्रयोगशाला घर परिवेश बनता है तो कभी घर परिवेश के ज्ञान का प्रयोगशाला विद्यालय बनता है। बच्चा कभी घर-परिवेश की समस्याओं का समाधान विद्यालय में तलाशता है तो कभी पाठ्यक्रमों की समस्याओं का समाधान घर-परिवेश में। अर्थात बाल जिज्ञासा का हल स्कूल एवं घर परिवेश दोनों में ही खोजा जाता रहता है। कभी पाठ्यक्रमों से उत्पन्न जिज्ञासाओं का समाधान घर-परिवेश से प्राप्त होता है, तो कभी घर-परिवेश में उत्पन्न जिज्ञासाओं का समाधान पाठ्यक्रमों में। यह सिलसिला चलता रहता है और बच्चों के अन्दर तद्नुरूप मान्यताएँ स्थापित होती रहती हैं। वर्तमान पारिवारिक परिदृश्य से स्पष्ट होता है कि यह कही से भी विद्यालयी विषय-वस्तुओं द्वारा समझाये या पढ़ाये जाने वाले आदर्शों से तालमेल नहीं खाता। वर्तमान पारिवारिक परिदृश्य से सभी प्रचलित मान्यताएँ और आदर्श लगभग मृतप्राय हो चुके हैं। ऐसे में बाल मन की जिज्ञासाएँ शान्त नहीं हो पाती। घर-परिवेश अब स्कूली ज्ञान का प्रयोगशाला नहीं बन पाता और न ही घर परिवेश की जिज्ञासाओं का समाधान पाठ्यक्रमों में मिल पाता है। अतः विद्यालयी विषयवस्तु समझकर आत्मसात करने की बजाय अब रट्टा मारे जाते हैं। अब ये बालमन को यथार्थ की बजाय काल्पनिक प्रतीत होते हैं जिनका एकमात्र विकल्प रट्टा मारना होता है। वर्तमान पारिवारिक परिदृश्य से आदर्श आचरण, व्यवहार, सहयोग, सहानुभूति, सेवा, सहायता, सम्मान, बड़ा-छोटा, आज्ञापालन इत्यादि लगभग गायब हो चुके हैं, जबकि पाठ्यक्रमों में इन्हीं को समझाने एवं बाल मन में स्थापित करने का उपक्रम किया जा रहा है। ऐसे में बिना प्रयोगशाला में परीक्षण किये बालमन उसे कैसे आत्मसात कर पाएगा। दूसरी तरफ वर्तमान जीवनशैली द्वारा उत्पन्न बालमन की जिज्ञासाओं का समाधान पाठ्यक्रमों में कैसे प्राप्त हो पायेगा, यह एक विकट प्रश्न खड़ा हो गया है। बच्चों का सबसे अधिक सानिध्य माता के साथ रहता है, अतः माता-पिता के आचरण और व्यवहार का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। माता-पिता के पारस्परिक आचरण बच्चों में बुनियादी मान्यताओं को स्थापित करते हैं। इनमें भी सबसे अधिक सानिध्य माता के साथ होता है और माता के आचरण व्यवहार ही बच्चों के आचरण व्यवहार की आधारशिला रखते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि माता ही प्रथम शिक्षिका होती है, क्योंकि अधिकतर बातें बच्चे माता से ही सीखते हैं। जो माता अपने पति की बात नहीं मानती, उसकी बातों को नहीं सुनती या उसकी अवहेलना करती है, और पति की बातों के विपरीत अपने मन से काम करती है, उस घर के बच्चों को चाहे लाख बार पढ़ाया या समझाया जाए कि बड़ों की बात माननी चाहिए और राम-लक्ष्मण के बनवास प्रकरण का लाख बार उदाहरण दिया जाए, उस घर के बच्चे कभी नहीं समझ सकते और उनमें बड़ों की बात मानने की प्रवृति कभी नहीं पैदा हो सकती। इसी प्रकार से ऐसी माँ, जो अपनी बात अपने पति से जबरदस्ती मनवाती हो, या विभिन्न उपक्रमों द्वारा मनवाती हो, उस घर के बच्चों में भी ऐसी ही प्रवृति स्वतः पैदा हो जाएगी जिसमें वे बच्चे अपने बड़ों से अपनी जिद मनवाने का प्रयास करेंगे और इसके लिए विभिन्न उपक्रम करेंगे। ऐसे घरों के बच्चों पर स्कूलों द्वारा पढ़ाया जाने वाले आज्ञाकारिता के पाठों और भीष्म पितामह के उदाहरणों का कोई असर नहीं पड़ने वाला। इसी प्रकार जो दम्पत्ति अपने माता-पिता, सास-ससुर की सेवा और सम्मान नहीं करते, उनके बच्चों को चाहे जितने महँगे और ख्याति प्राप्त स्कूलों में पढ़ाया जाए, उनके माता-पिता या बड़े बुजुर्गों की सेवा और सम्मान का भाव कदापि नहीं पैदा हो सकता, चाहे लाखों बार उनको श्रवण कुमार के प्रसंग का उदाहरण उनके सम्मुख रखा जाए। अतः दम्पत्ति अपनी बुजुर्गीयत वृद्धाश्रमों में काटने की विवशता की बुनियाद स्वयं अपने आचरण एवं व्यवहार द्वारा रखते हैं, क्योंकि उनके बच्चों में बुजुर्गों की सेवा और सम्मान का भाव, मान्यता के रूप में स्थापित ही नहीं हो पाता। वे बच्चे कभी ये महसूस ही नहीं कर पाते कि बुजुर्गों का सम्मान एवं सेवा उनका नैतिक दायित्व है क्योंकि वे अपने माता-पिता को ऐसा करते नहीं पाते। एक सार्वभौम सत्य यह भी है कि प्रत्येक बच्चों के जीवन के प्रथम आदर्श उनके माता-पिता में से ही कोई एक होता है और उसी के आचरण एवं व्यवहार को वे मान्यता के रूप में आत्मसात करते हैं। वर्तमान परिदृश्य से यह भी देखने को मिलता है कि माता-पिता बच्चों से झूठ बुलवाते रहे हैं, जैसे- घर में रहते हुए भी बच्चों से कहलवाते हैं कि आगन्तुक से जाकर कह दो कि पापा घर पर नहीं हैं। संचार माध्यमों पर भी इस प्रकार के उपक्रम बच्चों से ही कराये जाते हैं और आने वाली फोन कॉल पर बच्चों से झूठ बोलने को कहा जाता है। इतना ही नहीं, माता-पिता घर में सामान रहते हुए भी उसे माँगने वालों से बच्चे के सामने ही कहा जाता है कि अमुक सामान हमारे यहाँ नहीं है अथवा पर्याप्त रहते हुए भी यह कहा जाता है कि यह बस अपने काम भर का ही है। ऐसे दम्पत्तियों के बच्चों में सत्यवादी, सहयोगी, दानी, परोपकारी, सहिष्णुता इत्यादि भावों का पैदा होना मुश्किल ही है, चाहे उनको लाख बार दानवीर कर्ण, सत्यवादी युधिष्ठिर और राजा हरिश्चन्द्र का पाठ पढ़ाया जाए। इतना ही नहीं, इन घरों के बच्चे कुछ दिनों बाद अपने माता-पिता से ही झूठ बोलने लगते हैं। अतः सभी माता-पिता को यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि उनके बच्चों में दोहरे मापदण्ड स्थापित नहीं हो सकते जो उनके लिए तो सत्यवादी और आज्ञाकारी हो और अन्य के लिए झूठा और फरेबी। सामान्यतया अधिकांश परिवारों द्वारा कुछ व्यक्तियों को अधिक मान-सम्मान दिया जाता है या प्रदर्शित किया जाता है। उन परिवारों के छोटे बच्चे बड़े गौर से उन व्यक्तियों के व्यक्तित्व एवं उनके सम्मान प्राप्त करने के कारणों की परख करते हैं। उनके मन में यह बात मान्यता के रूप में स्थापित हो जाती है कि अमुक कर्म व्यक्ति को सम्मान प्राप्त कराते हैं एवं वे वैसे ही कर्मों को करने की चेष्टा करते हैं या उस व्यक्ति जैसा ही बनने का प्रयास करते हैं। कुछ परिवारों में लालचवश या डर से ऐसा किया जाता है, बच्चे अगर परिवार के लोगों के भाव समझ जाते हैं तो वे भी वही व्यवहार वैसे व्यक्तियों के साथ करते हैं और अगर नहीं समझ पाते तो वैसे ही व्यक्तियों को अपना आदर्श मान लेते हैं। कुछ परिवारों द्वारा आवश्यकता पड़ने पर कुछ खास व्यक्तियों के प्रति अतिसम्मान प्रदर्शित किया जाता है, परन्तु कार्य सिद्ध हो जाने पर उनको नजरअन्दाज किया जाने लगता है। ऐसे घरों के बच्चे अगर पारिवारिक भाव समझ गए तो इसी कार्यव्यवहार को मान्यता के रूप में स्थापित कर लेते हैं और अगर नहीं समझ पाए तो ऐसे ही व्यक्तियों को अपना आदर्श मान लेते हैं। अतः ऐसे परिवार, जिनमें शिक्षकों, चिकित्सकों, अभियन्ताओं, प्रशासनिकों को सम्मान प्राप्त होता है, उन घरों के बच्चों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर शिक्षक, चिकित्सक, अभियनता अथवा प्रशासनिक अधिकारी बनने की प्रवृति पैदा हो जाती है। उसी प्रकार कलाकारों, शिल्पकारों, गीतकारों, साहित्यकारों, कवियों, समाजसेवियों को सम्मान देने वाले परिवारों के बच्चों में उपर्युक्त व्यक्तित्वों के पैदा होने की बुनियाद पड़ जाती है। इसके ठीक विपरीत अपराधियों, धूर्तों, पाखण्डियों, ठगों, घोटालेबाजों, सट्टाबाजों को सम्मान देने वाले परिवारों में उपर्युक्त प्रकार के व्यक्तित्वों के पैदा होने की प्रबल संभावना पैदा हो जाती है। मतलब से सम्मान देने वाले परिवारों एवं मतलब सिद्ध होने के बाद नजरअन्दाज करने वाले परिवार के बच्चे भी आजीवन धूर्तता में ही लिप्त रहते हैं, वे व्यक्तित्व विकास की कल्पना भी नहीं करते। उपर्युक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि मात्र शिक्षा द्वारा ही बच्चों में आदर्श आचरण एवं व्यवहार प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता, इसके लिए परिवार और परिवेश का भी सार्थक योगदान है। इसके लिए माता के आचरण और व्यवहार का योगदान सर्वाधिक है, तो पति-पत्नी के आपसी आचरण और व्यवहार का भी सर्वाधिक योगदान है। अतः बच्चों में आदर्श स्थापित करने के लिए माता का आचरण और व्यवहार एवं पति-पत्नी के आपसी व्यवहार का आदर्श होना अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि घर की भूमिका प्रथम विद्यालय की और माता की भूमिका प्रथम शिक्षिका की होती है। पति-पत्नी के आपसी सम्बन्ध एवं आचरण इस विद्यालय के पाठ्यक्रमों की भूमिका अदा करते हैं। अतः बच्चों में आदर्श स्थापित करने हेतु एवं विभिन्न स्थापित आदर्शों को मान्यता के रूप में बच्चों में स्थापित करने हेतु सर्वप्रथम माता-पिता को अपने आचरण और व्यवहार में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता होती है। मात्र स्कूली शिक्षा के माध्यम से आदर्श आचरण और व्यवहार की कल्पना या अपेक्षा करना बेमानी ही होगी।
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Posted On:  16/Mar/2017
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
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123
 
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