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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

Women Empowerment
 
Article Title:  मान्यतावों की व्यूह में फँसी नारी मुक्ति

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Article Content:  एक विकसित परिवार के लिये आवष्यक है कि परिवार के सभी सदस्यों का अर्जन में योगदान हो, कोई भी परिवार विकास की ओर तभी अग्रसर होगा, जब उसके सारे सदस्य अपनी क्षमता एवं योग्यतानुसार विकास में अपना योगदान कर रहे हों। वो परिवार कभी भी विकास की राह नहीं पकड़ सकता जिसके एक-आध सदस्य विकास में योगदान कर रहे हों और बाकी उनपर बोझ बनें हों। अगर विकास का यह मानक एक परिवार पर लागू है तो वह देष कैसे विकसित देषों की श्रेणी में आयेगा, जिसमें 50ः महिलायें, 22.5ः दलित एवं बुजुर्ग विकास में अपना सार्थक योगदान न कर रहे हांे। अर्थात सारी घोशणये, सारी वयानवाजी सारे आंकड़े मात्र छलावा हैं यथार्थ से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर ही डा0 अम्बेडकर नें संविधान में स्त्री-पुरूश को समान अधिकार एवं अनुसूचित जाति-जनजातियों के लिये आरक्षण का प्राविधान किया होगा। जब तक देष की समस्त स्त्री-पुरूश छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची जातियों का योगदान विकाष में नहीं होगा तब तक विकसित भारत की कल्पना मात्र छलावा ही होगा। वर्तमान परिदृष्य से यह स्पश्ट है कि संविधान में समान अधिकार होनें के बावजूद भी भारतीय नारी अभी भी विकास में सार्थक योगदान नहीं कर पा रही है। उसकी मुक्ति का पथ अभी भी वाधित है जिसकी वजह से क्षमता और योग्यता होने के बावजूद भी उसका योगदान विकाष में नगण्य हैं। 99ः महिलायें अभी भी घर की चहारदीवारी के अन्दर ही कैद हैं और नारी मुक्ति एक सपना बना हुआ है। मेरी समझ से जब स्त्री, पुरूशों के समान ही कहीं भी षिक्षा ग्रहण हेतु आ-जा सके, कही और किसी समय नौकरी अथवा व्यवसाय के संबन्ध में आ जा सके। जब वह पुरूशों के समान अपने निर्णयों को अमल में ला सके। सम्पत्ति क्रय-विक्रय में उसका समान अधिकार सुनिष्चित हो सके तब कहीं नारी मुक्ति की कल्पना साकार होगी और संविधान की मंषा के अनुसार नारी मुक्त होगी तब उसका सार्थक योगदान विकाष में संभव हो पायेगा एवं उसके बाद ही विकसित भारत की कल्पना साकार होने का सूत्रपात होगा। अन्यथा नारी मुक्ति भाशणों, बहसो एवं उपहारों तक ही सीमित रह जायेगा और विकसित भारत की इवारत कभी भी नहीं लिखी जा सकेगी। अगर विष्व परिदृष्य मं हम भारतीय नारियों की स्थिति को समीक्षा करें तो यह स्पश्ट होता है कि जहाँ विकसित देषों की स्त्रियों को षिक्षा ग्रहण करने, व्यवसाय के संबन्ध में, नौकरी एवं यहाँ तक कि देषाटन हेतु कही भी अकेले आने-जानें की स्वतंत्रता हैं वहीं यह स्वतंत्रता हमारे देष में नहीं है जो न सिर्फ समानता के अधिकर से वंचित करती है बल्कि योग्यता हासिल करनें में भी वाधक है। यहाँ तक कि हमारे देष में ही विकसित प्रदेषों जैसे गुजरात, महाराश्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, दिल्ली, बंगाल इत्यादि में भी यह स्वतंत्रता वहाँ कि महिलाओं को कमोवेस प्राप्त है जबकि अधिकांष हिस्सों की महिलायें इससे वंचित हैं। और इसका सबसे बुरा प्रभाव उनकी योग्यता हासिल करने पर पड़ रहा है। अगर हमारी अर्थव्यवस्था और नीतियाँ अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्राँस इत्यादि की राह पर चल रहीं हैं तो हमें उन्हीं विकसित देषों की तर्ज पर नारी स्वतंत्रता को भी स्वीकार करना होगा। अन्यथा विकसित देष का सपना पूरा होना संभव नहीं होगा। मात्र नीतियों की नकल से काम नहीं चलेगा सामाजिक ढाँचें में भी उन्ही के अनुसार परिवर्तन करना होगा एवं स्थापित मान्यताओं को पुनः परिभाशित करना होगा। विना सामाजिक परिवर्तन आर्थिक परिवर्तन एक दिवास्वप्न ही साबित होगा। अमेरिका जैसे विष्व षक्ति बनने के लिये हमें अपने सम्पूर्ण मानव संसाधन को योग्य बनाना पड़ेगा और इसके लिये हमें लड़कियों एवं स्त्रियों को स्थापित मान्यताओं के व्यूह से आजाद करना होगा एवं उनकी विकास में भागीदारी सुनिष्चित करनी पड़ेगी। आधी आवादी के विकास में योगदान सुनिष्चित किये बिना विष्व षक्ति बनने का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। हमारे देष में नारी मुक्ति की राह में सबसे बड़ी बाधा हमारी सामाजिक मान्यतायें हैं जो नारी स्वतंत्रता की राह रोके खड़ी हैं। जहाँ लड़कियों को विद्यालय जानें और महिलाओं को बाजार जाने के लिये भी किसी पुरूश के संरक्षण की वाध्यता हो, उस देष के महाषक्ति बनने की कल्पना, वैषाखी के सहारे मैराथन दौड़ जीतनें की कल्पना जैसी ही होगी और परिणाम पहले ही तय हो चुका होगा। हमारे समाज में कौमार्य की मान्यता नारी स्वतंत्रता की राह और विकास में नारियों की सार्थक भागीदारी में सबसे बड़ा रोड़ा है। जहाँ विकसित देषों एवं यहाँ तक कि अपने ही देष के विकसित प्रदेषों में कौमार्य तब तक संरक्षित होने की मान्यता है जब तक गर्भधारण न हो जाय वही हमारे समाज में किसी लड़के या पर पुरूश से बात करने या मिलने मात्र से ही कौमार्य पर प्रष्न चिन्ह लग जाता है। और यही मान्यता लड़कियों और स्त्रियों को षिक्षा, नौकरी अथवा व्यवसाय हेतु कही आने-जाने में रोक लगा देता है। इसी मान्यता की वजह से पिता-भाई अथवा घर का मुखिया स्त्री स्वतंत्रा का जाने-अनजाने विरोध करता है और आधे मानव संसाधन को देष के विकास में सार्थक योगदान करने से वचित करता है जबकि विकसित देषों में इसी मान्यता का गर्भधारण तक कि सीमा तक स्वीकारोक्ति समस्त नारी जगत को स्वतंत्रा एवं उत्पादकता एवं देष के विकास में सार्थक सहयोग का साक्षी बनता है। अतः वर्तमान समय की यह माँग है कि हम अपनी इस मान्यता पर पुर्नविचार करें एवं इसका पुर्ननिर्धारण कर ऐसे स्थापित करें कि वर्तमान वैष्विक नीतियों से हम सामन्जस्य बैठा सके और हमारे षत प्रतिषत मानव संसाधन का विकास में सार्थक योगदान सुनिष्चित हो सके। अन्यथा विकसित देष एवं महाषक्ति बनने का सपना, सपना ही रह जायेगा। मेडिकल साइन्स भी इस बात को प्रमाणित करता है कि स्त्री षरीर में कोई भी हार्मोनिक परिवर्तन गर्भधारण के पूर्व नहीं होता। अर्थात स्त्री षरीर में कोई भी परिवर्तन गर्भधारण के उपरान्त ही षुरू होता है। ऐसे में जब कोई परिवर्तन ही नहीं होता तो कौमार्य की सीमा गर्भधारण तक करनें में क्या कठिनाई है। हम पष्चिमी विकसित देषों की मान्यता को क्यों नहीं स्वीकार कर सकते ? और अगर नहीं कर सकते तो विष्व महाषक्ति बननें का सपना क्यों देखते हैं ? हम पहले से ही विष्व के सबसे बड़े बाजार के रूप में प्रतिस्थापित हैं वही ठीक है। अगर हमें विकसित देष एक बाजार के रूप में देखतें है तो इसमें हर्ज क्या है ? यह तो स्वभाविक ही है जहाँ 25 कमायेगें और 75 बैठ कर खायेगें वो बड़ा बाजार के रूप में ही तो देखा जायेगा। हमे अभी नये-नये विष्व महाषक्ति की ओर अग्रसर पड़ोसी देष चीन से भी सीख लेने की जरूरत है जहाँ पर सामाजिक मान्यताओं के पुर्ननिधारण की प्रक्रिया तेजी से चल रही है और विकास में स्त्रियों के योगदान का प्रतिषत लगातार बढ़ रहा है एवं तदनुसार ही चीन विष्वषक्ति की तरफ लगातार बढ़ता जा रहा है।
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Posted On:  15/Mar/2017
Auther Name:  सुमन वी0 आनन्द
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