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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

EDUCATIONAL
 
Article Title:  वैश्विक परिदृश्य में प्राथमिक शिक्षा की राष्ट्र-पुनर्निर्माण में भूमिका

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Article Content:  एक सक्षम राष्ट्र की पहचान उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक, शैक्षिक स्तर एवं नागरिकों के स्वास्थ्य के स्तर से परिभाषित होती है। उपरोक्त साधनों की प्राप्ति के मूलतः दो साध्यमार्ग शिक्षा एवं अर्थव्यवस्था हैं। किसी भी राष्ट्र की मजबूती समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप साध्य मार्गों के परिवर्धन पर निर्भर करती है। वैश्विकरण के युग में किसी भी राष्ट्र के पुनर्निर्माण हेतु इन साध्य मार्गों की समय-समय पर समीक्षा एवं परिवर्धन आवश्यक है। भारत के पुनर्निर्माण के विश्लेषण हेतु इन साध्य मार्गों का विश्लेषण आवश्यक है, क्योंकि इनका आपस में गहन समन्वय है। शिक्षा से अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती है तो इसका विपरित भी उतना ही सत्य है। किसी मजबूत राष्ट्र की आर्थिक स्थिति उसकी अर्थव्यवस्था की अवस्थापना पर निर्भर करती है। आर्थिक सुधार के मूलतः दो क्षेत्र हैं- उत्पाद क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र। उत्पाद क्षेत्र को अपने देश के परिप्रेक्ष्य में मूलतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- कृषि क्षेत्र एवं उद्योग क्षेत्र। यदि वर्तमान में अपने देश के वर्तमान में मूलतः सेवाक्षेत्र पर आधारित हो गयी है। उसके बाद उद्योग क्षेत्र का आंशिक योगदान है जबकि कृषिक्षेत्र का योगदान नगण्य मात्र रह गया है। यह भी सर्वविदित है कि सेवा क्षेत्र के आधार वाली अर्थव्यवस्था में स्थायित्व नहीं होता। यह किसी भी समय घराशायी हो सकती है। उत्पाद क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में स्थायित्व होता है, वह भी कृषिक्षेत्र एवं उद्योग क्षेत्र के क्रमानुसार। अर्थात कृृषि उत्पाद क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, उद्योग क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के सापेक्ष अधिक स्थायी होती है। वर्ममान वैश्विक मंदी एवं देश की महंगाई की दशा में उपरोक्त बातें स्वतः स्पष्ट हो जाती हैं। यदि इस देश के परिप्रेक्ष्य में इसका विश्लेषण किया जाय तो यह स्पष्ट होता है कि हमारी अधिसंख्य जनसंख्या का झुकाव क्रमानुसार सेवाक्षेत्र, उद्योगक्षेत्र, कृषिक्षेत्र है, जबकि अर्थव्यवस्था का स्थायित्व इसे विपरित क्रम में होता है। ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्र पुनर्निर्माण हेतु इन स्थितियों की गहन समीक्षा एवं तद्नुसार परिवर्तन एवं परिवर्धन की तत्काल आवश्यकता महसूस होती है। वर्तमान परिस्थितियों के सूक्ष्म विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि उपरोक्त परिस्थितियों की मुख्य जिम्मेवारी हमारी वर्तमान प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा व्यवस्था है। अतः वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्र पुननिर्माण हेतु शिक्षा व्यवस्था का मूल ढाँचा ही सेवाक्षेत्र के लिए हमारे नागरिकों को तैयार कर रहा है। इस व्यवस्था में शिक्षित युवा सीमित सेवाक्षेत्र में अवसर न प्राप्त होने पर अनपढ़ से भी अधिक असहाय हो जाता है और हमारी नीतियाँ उसको और संवर्धित कर रही हैं। ऐसी दशा में हमारा पूरा देश इस समय संचार, सूचना तकनीकी, फिल्म, इत्यादि सेवाक्षेत्रों की दिवानगी में है। हर नागरिक इन्हीं क्षेत्रों में अपनी सेवा देने का इच्छुक है। हमारे शिक्षण संस्थान भी इन्हीं क्षेत्रों की विशेषज्ञता प्रदान कर रहे है। प्राथमिक स्तर से ही छात्रों को मानसिक रूप से इन्हीं सेवाक्षेत्र हेतु तैयार किया जा रहा है। पूरी शिक्षा व्यवस्था ही वैश्विक स्तर पर मात्र 5 प्रतिशत रोजगार देने वाले इन सेवा क्षेत्रों की तरफ झुकी है। ऐसी परिस्थितियाँ मंे हमारे देश में बेरोजगारों, नक्सलियों एवं आतंकवादियों की फौज खड़ा होना कोई आकस्मिक घटना नहीं है और न ही हत्याएँ अथवा आत्महत्याएँ ही आकस्मिक हैं। इसके लिये मूलतः हमारी शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार है जो 95 प्रतिशत रोजगार क्षेत्रों को छोड़कर मात्र 5 प्रतिशत रोजगार क्षेत्रों हेतु विशाल जनमानस को तैयार कर रही है। अतः वैश्विकरण के युग में राष्ट्र पुनर्निर्माण हेतु हमारी शिक्षा व्यवस्था को प्राथमिक स्तर से ही कृषि क्षेत्र, उद्योग क्षेत्र एवं तदुपरान्त सेवाक्षेत्र हेतु हमारे नागरिकों को मानसिक रूप से तैयार करने वाली नीति अपनानी पड़ेगी एवं राष्ट्र की मजबूती के अन्य आधार स्तम्भ सामाजिक संस्कृति, कला, विज्ञान, इतिहास एवं राजनीतिक स्थितियों-परिस्थितियों का समायोजन सुनिश्चित कर एक सम्यक शिक्षा नीति की बुनियाद रखनी होगी जो स्थायी अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों का विकास सुनिश्चत कर सकें। सेवाक्षेत्र, उत्पाद क्षेत्र की छाँट है जहाँ उत्पाद क्षेत्र सुदृढ़ होगा सेवाक्षेत्र स्वतः ही उत्पन्न हो जायेगा। अतः सेवाक्षेत्र आधारित शिक्षा नीति की बजाय उत्पाद क्षेत्र आधारित शिक्षा नीति एवं शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है। विश्व के लगभग समस्त शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने इस पर विशेष बल दिया है कि बचपन में रुचियों का परिष्कार करने पर वह संस्कार का रूप ले लेती है। अतः प्राथमिक शिक्षा में ही बच्चों में ऐसी रुचि विकसित करने का वातावरण सृजित किया जाना समीचीन होगा, जिससे बच्चे में तकनीकी हुनर पैदा हो सके व बच्चा आत्मनिर्भरता के स्वाभिमान से ओतप्रोत हो सके। इससे एक ऐसा सकारात्मक माध्यम से ही समय की माँग के अनुसार नागरिकता का प्रशिक्षण शिक्षा की नींव डालनी होगी जिसमें दीक्षित होकर बालक बचपन से ही उत्पाद क्षेत्र का महत्व समझ सके व तद्नुसार स्वयं को अनुकूलित भी कर सके। चूँकि शिक्षा दीर्घकालीन विनियोग है, अतः आज इन स्थितियों को समझकर शैक्षिक रणनीति तैयार की गयी तो आने वाले दशक में इसके सुफल प्राप्त होने लगेंगे। युवक सेवाक्षेत्र पर निर्भर न होकर उत्पाद क्षेत्र से जुड़कर एक स्वावलम्बी एवं आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के रूप में स्वतः को प्रतिष्ठित करने में समर्थ होंगे।
Article Subject: 
Posted On:  24/Dec/2016
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
Article ID: 
Article Title:  आजाद देश की गुलाम शिक्षा

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Article Content:  मूलतः व्यक्तित्व का निर्धारण, व्यक्ति के मन मस्तिष्क में निहित मान्यताओं के द्वारा एवं मान्यताओं का निर्धारण व्यक्ति के शिक्षा की गुणवत्ता द्वारा होता है। सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक गुलामी तो वर्ग संघर्ष, तख्ता पलट, मताधिकार द्वारा संभव है परन्तु मानसिक गुलामी को खत्म करने हेतु शिक्षा में सुधार की आवश्यकता होती हैं, जो व्यक्ति के अन्दर स्थापित मान्यताओं का परिवर्तन करती है। संस्कृति द्वारा संचरित होकर व्यक्ति के अन्दर स्थापित होने वाली मान्यताओं का एक मात्र माध्यम शिक्षा ही है। जब माध्यम ही विकृत कर दिया जायेगा तो ऐसी मान्यताएं मन - मस्तिष्क में स्थापित हो जायेगी जो स्वतंत्रता और गुलामी में विभेद न कर सकें। गुलामी महसूस न की जा सके और व्यक्ति गुलाम होते हुये भी अपने आप को स्वतंत्र महसूस करें। कुछ ऐसी ही परिस्थितियां भारतीय समाज की हैं। बेशक़ राजनीतिक रुप से हम छः दशक से ज्यादा समय से आजाद है परन्तु क्या हमारा समाज इतने वर्षों के बाद भी आर्थिक एवं सामाजिक रुप से वास्तविक रुप में आजाद हो पाया है ? अभी अधिसंख्य लोग इसको समझनें योग्य ही नहीं हो पाये हैं और इसका मूल कारण यह है कि अभी तक हमारी शिक्षा गुलाम है। हमने इसको न तो आजाद किया और न ही इसका प्रयास किया। एक बार डा० अम्वेडकर ने संविधान में शिक्षा को मूल अधिकार में जोड़कर आजाद कराने का प्रयास भी किया तो संविधान सभा में तत्काल राजा महाराजाओं के घोर विरोध के चलते, जिसके अगुआ महाराज दरभंगा (बिहार) थे, इसका कत्ल हो गया और भारतीय संविधान में शिक्षा डाइरेक्टिव प्रिंसिपल मे संयोजित कर दी गई । सभ्यता के विकास के साथ ही शिक्षा गुलाम बना दी गयी । इसकी शुरुआत धार्मिक गुलामी से आरम्भ हुई, और उसके बाद राजनैतिक गुलामी के युग की शुरुआत हुई। भारतीय भूभाग पर शिक्षा की राजनैतिक गुलामी उसी समय से शुरू हो गयी जबसे महाजनपदो का प्रादुर्भाव हुआ। ईसा पूर्व बने सभी महाजनपदो ने अपनी-अपनी राजनीतिक हितों के अनुसार शिक्षा व्यवस्था को निरुपित किया। इतना ही नहीं लगभग सभी महाजनपदों ने शिक्षा को कुछ सीमित वर्ग तक ही अधिकृत किया एवं शेष जनमानस को राजनीतिक लाभ हेतु वंचित कर दिया। भाषा का चयन भी कुछ इस प्रकार किया गया जो आम लोगो के समझ से परे हो। संस्कृत, पाली, होकर आम-जनमानस तक न पहुँच सके एवं भाषा का प्रयोग शिक्षा की गोपनीयता बनाये रखने के उद्देश्य से किया गया। 11वीं शताब्दी में मुगल शासन की शुरूआत हुई तो उन्होंने भी पुराने तर्ज पर शिक्षा को गुलाम ही रखा और इसकी गोपनीयता कायम रखने हेतु नयी भाषा अरबी और फारसी का प्रयोग आरम्भ किया। न तो उन्होंने शिक्षा को मुक्त किया और न ही आम लोगो के लिये इसका दरवाजा खोला। मुगल काल के बाद भारत में पुर्तगाली, फ़्रांसीसी और अंग्रेज शासन का प्रादुर्भाव हुआ, वो भी पुराने ढर्रे पर चले और शिक्षा को कैद में ही रखा और गोपनीयता के लिये फ़्रांसीसी, पुर्तगाली एवं अंगेजी का प्रयोग शुरू किया। हाँ अंग्रेजों ने भारतीय जनमानस पर एक बड़ा उपकार यह किया जो शिक्षा सदियों से आम जनमानस को सुलभ नहीं थी उसको आम जनमानस के लिये लागू कर दी। इन आम जनमानस में महिला शिक्षा भी शामिल थी। अर्थात अंग्रेजों ने सर्वप्रथम व्यापक रुप से महिलाओं और वंचित वर्ग के लिये शिक्षा का दरवाजा खोल दिया। परन्तु इसका राजनीतिक लाभ लाभ लेने के लिये उन्होंने शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही रखा। और वाकायदा लार्ड मैकाले के नेतृत्व में भारतीय शिक्षा नीति की शुरुआत हुई। आजाद भारत की स्थिति भी अपने पुराने ढर्रे पर ही है। आज भी शिक्षा का सबसे प्रमुख माध्यम अंग्रेजी ही है। शायद वर्तमान राजनैतिक घरानो को यही भाषा सबसे ज्यादा राजनीतिक लाभ देती है। सरकारी कामकाज भी अधिकांश विभागों में अंग्रेजी में ही होते है। हाँ न्यायकि एवं राजस्व सेवाओं में अभी भी उर्दू का बहुतायत में प्रयोग होता है। जिसकी वजह से स्वतंत्र भारत की शिक्षा व्यवस्था भी गुलामी से मुक्ति नहीं पा सकी है और न ही भविष्य में पाने की कोई गुंजाइश दिख रही है। क्योंकि अब भारतीय औद्योगिक घरानों की कुदृष्टि इस पर पड़ चुकी है और वे ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तर्ज पर अपना मायाजाल फैलाना शुरू कर दिये है और शिक्षा को अपनी कैद में लेते जा रहे है। आखिर उन्हें भी तो इस राष्ट्र पर राज करना है तो वे शिक्षा को कैसे आजाद होने दे सकते है। डा० राम मनोहर लोहिया की आशंका अब सच होती दिख रही है कि बहुत जल्द पूँजीपति शिक्षा, चिकित्सा और भवन में मुनाफा सूंघ लेगे और इसका व्यवसाय शुरू कर देगें। सभी राज्यों के प्रमुख शहरों में पूजीपतियों का भवन निर्माण, अस्पताल एवं विद्यालयो के निर्माण क्षेत्र में उपस्थिति इसको प्रमाणित कर रही है अर्थात् हम भले ही राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल कर चुके हो। परन्तु सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता हमारे लिये स्वप्न ही रहेगी क्योंकि हमारी शिक्षा अभी तक न तो आजाद हो सकी है और नही इसके आसार नजर आ रहे है। इतिहास यही बताता है कि शिक्षा की यात्रा अब तक धार्मिक मठों द्वारा अपने अनुयायियों को अपनी कूट भाषा में, अपने धर्मावलम्बियों को अपने साथ जोडे रखने हेतु या अपने धर्म के प्रति आस्था और विश्वास बनाये रखने हेतु एवं काल्पनिक कहानियों या उदाहरणों के माध्यम से शुरू हुई। तदुपरांत राजशाही के दौर में शिक्षा राजाओं द्वारा अपने कर्मचारियों, जमींदारों, गुप्तचरों इत्यादि के लिये अपनी-अपनी कूट भाषा में, अपनी-अपनी प्रजा पर नियंत्रण बनाये रखने हेतु एवं अपनी कार्यप्रणाली की गोपनीयता बनाये रखने हेतु, काल्पनिक प्रगति की घोषणाओं एवं मनोहारी उदाहरणों के माध्यम से दी जाने लगी। इसके बाद भारत भूमि पर मुगलकाल का प्रादुर्भाव हुआ। इस दौर में भी शिक्षा की नीति एवं नीयत में कोई परिवर्तन नही हुआ और इस दौर में भी शिक्षा मुगल शासकों द्वारा अपने अधीनस्थों को या संभावित अधीनस्थों के लिये कूट भाषा अरबी-फारसी या उर्दू के माध्यम से प्रजा पर नियंत्रण एवं राज्य के विस्तार हेतु एवं सुदूर अरब देशीय उदाहरणो एवं कहानियों के माध्यम से दी जाने लगी। अव तक के दौर में शिक्षा को सर्वसुलभ नहीं कराया गया था। इसके बाद अंग्रेजों का शासन शुरू हुआ इसमें भी शिक्षा अंग्रेज शासकों द्वारा, कर्मचारियों या संभावित कर्मचारियों के लिये, कूट भाषा अंग्रेजी में और पश्चिमी देशों के उदाहरणों एवं कथा-कहानियों के माध्यम से भारतीय जनमानस पर नियंत्रण बनाये रखने के उद्देश्य से दी जाने लगी, हालांकि देश आजाद हुये छः दशक बीत चुके हैं परन्तु अंग्रेज नीति एवं नीयत अभी भी हमारी शिक्षा व्यवस्था पर प्रभावी है। वर्तमान में एक और भी अत्यन्त भयावह स्थिति का सूत्रपात शिक्षा की गुलामी पर शुरू हो चुका है। अब हमारी गुलाम शिक्षा बिकते-बिकते पूंजीपतियों के हाथ तक पहुँच चुकी है और अब यह पूँजीपतियों द्वारा, कर्मचारियों या संभावित कर्मचारियों के लिये कूटभाषा अंग्रेजी में अमेरिकी देशों के उदाहरणों एवं कहानियों द्वारा भारतीय उपभोक्ताओं को उनपर प्रभावी नियंत्रण बनाये रखने हेतु दिये जाने के कुचक्र का रूप धारण कर चुकी है। पूरे देश में इसका व्यापक आगाज भी हो चुका है। और काफी बुद्धिजीवी समझते हुये भी नासमझ होने का ढोंग कर रहें है या तो वे समझने योग्य हीं नहीं हैं, या पूँजीपतियों ने उन्हें अपने हितों को साधने हेतु ब्राह्मण सुन्दरी, विश्व सुन्दरी जैसे तमगा पहनाकर अपना उल्लू सीधा करना शुरू कर दिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि आजाद शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिये? मेरे विचार से जब शिक्षा, शिक्षकों द्वारा तय नीतियों के माध्यम से आम जनमानस के लिये, उनकी मातृभाषा में, क्षेत्रीय या स्थानीय उदाहरणों एवं कहानियों के माध्यम से आम जनमानस में आपसी सौहार्द, भाईचारा, समग्र विकास की सोच, अच्छाई-बुराई में अन्तर स्पष्ट करने की योग्यता बढाने की नीयत से दी जाने लगेगी एवं कूट भाषाओं को पूर्णतः प्रतिबन्धित कर दिया जायेगा। कपोल कल्पित कहानियों एवं उदाहरणों की तिलान्जलि दे दी जायेगी एवं सभी प्रकार के गुप्त नियंत्रणों की नीयत से मुक्त कर दी जायेगी। तब जाकर हम शिक्षा को आजाद कह पायेंगें। अब देखना यह है कि हम आजाद भारतवासी अपनी शिक्षा को कब तक आजाद करा पातें हैं। शिक्षा की स्वतंत्रता से मेरा अभिप्राय यह है कि जब तक शिक्षा को आम जनमानस को उसकी मातृभाषा में उपलब्ध नहीं करा दिया जाता एवं आयातित भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाकर गोपनीयता बनाना बन्द नहीं कर दिया जाता, तब तक शिक्षा को आजाद कहना बेमानी होगी। वर्तमान परिवेश में भी आयातित भाषाओं द्वारा सार्थक शिक्षा में बाधा पहुँचा कर राजनैतिक एवं आर्थिक लाभ उठाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। शिक्षा के स्वतंत्र हुये बिना भारतीय समाज की आर्थिक एवं सामाजिक स्वतंत्रता असंभव हैं सदियो से जारी राजनैतिक साजिश आज भी बदस्तूर जारी हैं दुनिया के सारे विकसित देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान जर्मनी में शिक्षा स्वतंत्र है जिसकी वजह से वहाँ आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक आजादी महसूस की जा रही हैं । पड़ोसी देश चीन में भी शिक्षा आजाद है जो उसे महाशक्ति बनाती जा रही हैं परन्तु हमारी शिक्षा आज भी गुलाम है जो हमारे आर्थिक एवं सामाजिक गुलामी का सबसे बड़ी कारण है आज शिक्षा धार्मिक मठों, रजवाड़ों के गुरुकुलो, जमींदारों के विद्यालयों की गुलामी करते हुये पूंजीपतियों के पब्लिक स्कूलों तक सफर कर चुकी है परन्तु आजाद नहीं हो सकी है।
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Posted On:  15/Oct/2016
Auther Name:  सुमन बी. आनन्द
Article ID: 
123
 
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Barnypok:Says PDbDSm http://www.LnAJ7K8QSpkiStk3sLL0hQP6MO2wQ8gO.com
ON: 31/03/17
dgdsgsdf:Says sdfgsdgsd
ON: 21/09/10
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