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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

ENVIRONMENTAL
 
Article Title:  तेरह का मानव जीवन पर प्रभाव

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Article Content:  अगर प्रकृति के विशाल मानकों का अध्येयन किया जाय तो हम यह स्प ष्टे देखते हैं कि समुद्र की हर तेरहवीं लहर अन्यह लहरों की अपेक्षाकृत सामान्यक से बडी है। पृथ्वीर पर पाए जाने वाले समस्तो जीव-जन्तु ओं का विभिन्नै वैज्ञानिकों के अध्येयन एवं उनके वर्गीकरण का भी सूक्ष्मप अध्येयन करने पर यह स्पनष्टध होता है कि पृथ्वीर के समस्तप जीव-जन्तुरओं को सामान्यंत: तेरह वर्गों में वर्गीकृत करना न्यालयोचित है। इसी प्रकार पृथ्वीस पर पायी जाने वाली समस्तर वनप्वर्तियों पर हुए विभिन्न् वैज्ञानिकों द्वारा अध्य्यन एवं उनके वर्गीकरण से भी यह स्पकष्ट‍ होता है कि समस्तर वनस्पातियों का वर्गीकरण भी तेरह वर्गों में करना ज्याकदा सटीक एवं उपयुक्त है। इसी प्रकार परम्पपरागत हिन्दीर महीनों का भी विभक्तिकरण तेरह माहों में किया गया है। एक माह 'मलमास' के रूप में होता हैा विभिन्नर हिन्दूा रीति-रिवाजों में भी तेरह का महत्वोपूर्ण स्थाेन है, यहॉ तक कि पुरानी परम्प रा के अनुसार गाय-भैंसों इत्याजदि दुधारू पशुओं के पहले तेरह दिन तक दूध का प्रयोग भी वर्जित है। उपर्युक्तै स्थूंल मानक यह स्पओष्टर करते हैं कि पूरी प्रकृति के संचालन में इस तेरह का महत्वइपूर्ण एवं दूरगामी प्रभाव है। विभिन्नह जीव-जन्तुनओं के जीवन-चक्र पर तेरह के प्रभाव का अध्य यन करने पर हम पाते हैं कि जीव-जन्तुुओं की प्राकृतिक आयु भी इस तेरह से प्रभावित है। यदि हम अपने आस-पास पाए जाने वाले जीव-जन्तुसओं के जीवन चक्र का विश्ले।षण करें तो यह देखते हैं कि गाय लगभग दो वर्ष की उम्र में गर्भधारण करने योग्यर होती है और इसकी अधिकतम उम्र पच्चीीस-छब्बीुस वर्ष के आसपास होती है। भैंस भी लगभग दो वर्ष में गर्भधारण योग्यउ होती है और इसकी भी प्राकृतिक उम्र अधिकतम पच्चीरस-छब्बीउस वर्ष के आसपास होती है। मनुष्यों के करीब रहने वाले कुत्तेच लगभग एक वर्ष में गर्भधारण योग्यह होते हैं और उनकी अधिकतम प्राकृतिक उम्र लगभग बारह-तेरह वर्ष के आसपास ही होती है। इसी प्रकार बिल्लियाँ भी लगभग एक वर्ष की आयु में गर्भधारण योग्यध होती हैं और इनकी भी अधिकतम आयु बारह-तेरह वर्ष के आसपास होती है। भेंड़ बकरियाँ इत्यादि लगभग छः माह की उम्र में ही गर्भधारण योग्य हो जाती हैं और इनकी अधिकतम आयु लगभग छः-सात वर्ष के आसपास होती है। घोड़े एवं गधे लगभग ............ वर्ष की आयु में गर्भधारण योग्य होते हैं और इनकी अधिकतम आयु लगभग ............ वर्ष की होती है। हाथी की लगभग ............. वर्ष में गर्भधारण योग्य होती है और इसकी अधिकतम उम्र लगभग ............ वर्ष के आसपास होती है। इस प्रकार हम पाते हैं कि विभिन्न जीव जन्तुओं की अधिकतम उम्र उनके गर्भधारण योग्य होने की उम्र के लगभग तेरह गुना के आसपास होती है। इसी प्रकार विभिन्न वनस्पतियों के जीवन चक्र पर तेरह के प्रभाव का अध्ययन करने पर यह दृष्टिगोचर होता है कि विभिन्न वनस्पतियों का जीवन चक्र भी इससे गहराई से प्रभावित होता है। यदि आसपास पायी जाने वाली वनस्पतियों का अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि आम के पौधों में सामान्यतः पाँच वर्ष की आयु में प्रथम बार बौर लगते हैं और आम के वृक्ष की अधिकतम उम्र लगभग साठ-पैंसठ वर्ष के आसपास होती है। अमरूद के पौधों में लगभग एक वर्ष के उम्र के आसपास प्रथम बार फूल आते हैं और अमरूद के पौधों की अधिकतम आयु लगभग बारह-तेरह वर्ष के आसपास होती है। महुआ के पौधों में लगभग पच्चीस वर्ष के उम्र के आसपास फूल आते हैं और इनकी अधिकतम उम्र तीन सौ साल के ऊपर होती है। इमली के पौधों में लगभग तीस वर्ष की आयु में प्रथम बार फूल आते हैं और इसकी अधिकतम आयु चार सौ साल के आसपास होती है। आँवला, नींबू, अनार, शरीफा इत्यादि पौधों में भी लगभग एक वर्ष के उम्र में प्रथम बार फूल आते हैं और इनकी भी अधिकतम आयु बारह-तेरह वर्ष के आसपास होती है। सर्वहितकारी नीम के पौधों में प्रथम बार फूल लगभग ........... वर्ष की आयु में आते हैं और नीम की अधिकतम आयु लगभग ..... वर्ष होती है। एक देसी कहावत भी है कि ‘पाँच आम, पच्चीसे महुआ, तीस बरीस पर इमली के फहुआ’। अर्थात वनस्पतियों का जीवन चक्र भी जीव-जन्तुओं के जीवन चक्र की भाँति तेरह से प्रभावित होता प्रतीत होता है। वनस्पतियों की भी अधिकतम आयु, प्रथम बार फूल/फल आने की उम्र के तेरह गुना के आसपास होती है। मनुष्यों के जीवन चक्र पर तेरह के प्रभाव का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि सिर्फ मनुष्य ही प्रकृति की एक ऐसी कृति है जो एक मिनट में लगभग तेरह बार साँस लेता है। इसके अतिरिक्त बालिकाएँ लगभग तेरह वर्ष की आयु में ही प्रथम बार रजस्वला होती हैं और बालाकों में भी लगभग तेरह वर्ष की आयु में ही स्खलन शुरु होता है। इतना ही नहीं, बालक एवं बालिकाएँ लगभग पच्चीस-छब्बीस वर्ष की आयु में जिम्मेदारी का अनुभव करने लगते हैं अथवा उनमें परिपक्वता स्वतः ही आ जाती है, अर्थात तेरह के दो गुनी उम्र में। तेरह की लगभग तीन गुना उम्र अर्थात उन्तालीस-चालीस वर्ष की आयु के आसपास स्त्री एवं पुरुषों में बड़ा ही महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है। सामान्यतया इस उम्र में महिलाओं का मासिक धर्म बन्द हो जाता है तथा पुरुषों में भी कई शारीरिक परिवर्तन महसूस किये जाते हैं। सामान्य बोलचाल में ‘चालीसा असर’ के रूप में जाना जाता है। अर्थात मनुष्यों में प्रत्येक तेरह वर्ष के गुणक की उम्र में कुछ खास परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि सिर्फ मनुष्य ही एक ऐसी प्राकृतिक कृति है जिस पर प्रकृति के तेरह का प्रभाव अपने वास्तविक गुणक अर्थात तेरह के रूप में पड़ता है। शायद इसीलिए मनुष्य को प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में जाना जाता है। प्रकृतिजन्य समस्त जीवधारियों एवं वनस्पतियों के सम्यक अध्ययन से यह भी स्पष्ट है कि मनुष्य ही प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति है। परन्तु विडम्बना यह है कि सार्वभौम प्रकृति की यह सर्वश्रेष्ठ कृति अपने ही सृजनकर्ता, प्रकृति से या तो सर्वथा अनभिज्ञ है अथवा उसकी अवहेलना कर रही है। उपर्युक्त अध्ययन एवं प्राकृति उदाहरणों को आधार मानकर सामान्य गणना के आधार पर हम पाते हैं कि मनुष्यों की प्राकृतिक आयु तेरह की तेरह गुना अर्थात लगभग एक सौ उनहत्तर-सत्तर वर्ष के आसपास होनी चाहिए। यह उम्र कोई अतिश्योक्ति भी प्रतीत नहीं होती क्योंकि अक्सर समाचार पत्रों एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी खबरें देखने-सुनने को मिलती ही रहती हैं कि अमुक गाँव में अमुक नामक व्यक्ति एक सौ चालीस-पचास की उम्र तक जिन्दा है या अमुक व्यक्ति एक सौ पैंतालिस साल की उम्र में शरीर का त्याग किया। अर्थात आज भी उपर्युक्त गणना कोई अतिश्योक्ति अथवा कपोल कल्पित तथ्य नहीं बल्कि वास्तविकता के आसपास ही है। अभी भी हमारे ही देश के गाँवों में बहुतेरे लोग जीवित हैं जो एक सौ दस-बीस वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं और अभी भी स्वस्थ हैं। उपलब्ध आँकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि दुनिया में सबसे लम्बी उम्र गड़ेरिया समुदाय के लोगों की होती है। यदि उनकी जीवन शैली का अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि गड़ेरिया समुदाय की जीवन शैली प्रकृति की सबसे करीबी जीवन शैली है। उनका ज्यादातर जीवन प्राकृतिक वातावरण में ही व्यतीत होता है। इसके अतिरिक्त प्राचीन काल में भी हमारे ऋषि-महर्षि की उम्र काफी अधिक होती थी। यहाँ तक कहा जाता है कि उनमें से कई अपनी इच्छा से शरीर त्याग करते थे। अर्थात उनमें इच्छामृत्यु की अद्भुत शक्ति विराजमान थी। अभी कुछ वर्ष पहले हमारे ही बीच योगीराज देवराहा बाबा जीवित किवदंती के रूप में विद्यमान थे। क्षेत्रीय लोग उनकी उम्र के बारे में तरह-तरह के कयास लगाते थे। कोई दो सौ साल, तो कोई ढ़ाई सौ साल, तो कोई तीन सौ साल का कयास लगाता था। कहने का तात्पर्य यह है कि एक सौ उनहत्तर वर्ष के आयु निरा कपोल-कल्पित गणना नहीं बल्कि सच्चाई महसूस होती है। इसके अतिरिक्त एक बात और भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि एक सौ उनहत्तर वर्ष की आयु मनुष्य की समान्य प्राकृति आयु है। योग, ध्यान, तप, जप अथवा आसन इत्यादि से उसे घटायी या बढ़ाई भी जा सकती है। और भी ढेर सारे उदाहरण भी हमारे धार्मिक ग्रन्थों एवं समाज में किवदन्तियों के रूप में मौजूद हैं। वर्तमान उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार मनुष्य की औसत आयु लगभग साठ-सत्तर वर्ष है। अर्थात वर्तमान में मनुष्य अपनी प्राकृतिक उम्र से लगभग सौ वर्ष कम ही जीवित रह पा रहा है। अब विचारणीय प्रश्न यह है कि जिस मनुष्य की प्रकृति ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में सृजित किया, आखिर क्या कारण है कि वही प्रकृति मनुष्य का अपनी प्राकृतिक उम्र की पूरी उम्र तक जीने की स्वीकृति नहीं दे रही है। दूसरे शब्दों में किन कारणों से प्रकृति मनुष्य की उम्र कम करती जा रही है? यह समाज एवं नीति-निर्धारकों के समक्ष एक यक्ष प्रश्न की भाँति खड़ा है और इसके विश्लेषण की तत्काल आवश्यकता प्रतीत होती है। वर्तमान परिस्थितियों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि मनुष्य प्रकृति के हर कृति चाहे वह जीव हो या वनस्पति अथवा स्वयं मानव, निरन्तर नये-नये प्रयोग करता जा रहा है और उसकी प्रकृति से निरन्तर छेड़छाड़ भी करता जा रहा है। उदाहरण के तौर पर मनुष्य के फलों के राजा आम पर प्रयोग कर उसको ऐसा बना दिया है कि जहाँ पाँच वर्ष की उम्र के उपरान्त फल आते थे, अब एक वर्ष के उम्र में ही फल आने लगे हैं। यहाँ तक कि ऐसी किस्में भी विकसित हो गयी हैं जो गमलों में भी रोपित की जा सकती हैं और साल भर फल देती रहती हैं। इसी प्रकार जामुन, बेल, महुआ, लीची, अमरूद एवं विभिन्न प्रकार के पुष्पों और शाक-सब्जियों पर भी प्रयोग कर उनको कम उम्र में ही फल देने वाले पौधों के रूप में विकसित कर दिया गया। इतना ही नहीं मनुष्यों ने विभिन्न जीवों पर भी प्रयोग करने से परहेज नहीं किया और ऐसी गाय-भैंसों की नस्लें भी विकसित कर दीं हैं जो कई गुना अधिक दूध देने लगी हैं। इसी प्रकार के प्रयोग कर भेंड़-बकरियों और मुर्गियों की भी ऐसी नस्लें विकसित कर दिया है जो कम उम्र में ही ज्यादा वजन की हो जाती हैं। यही प्रयोग विभिन्न मछलियों और सूअरों पर भी करके उनको कम समय में ज्यादा माँस देने वाली प्रजातियों में तबदील कर दिया है। अगर उपर्युक्त प्रयोगों के परिणाम निष्पक्ष एवं गहराई से अवलोकन किया जाए तो हम पाते हैं कि इन प्रयोगों के माध्यम से मनुष्य बड़े आकार एवं सुन्दर शक्ल-सूरत के फल दो से तीन गुना ज्यादा दूध एवं माँस तो कम उम्र अथवा समय में प्राप्त करने में जरूर कामयाब हुआ है। परन्तु इनकी गुणवत्ता, इनकी उम्र इनकी मजबूती की कीमत चुकाने के बाद। हम देखते हैं कि आज के आम, अमरूद, जामुन, बेल, महुआ इत्यादि वृक्षों, विभिन्न फूलों एवं शाक-सब्जियों की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है। उनकी उम्र तीन से चार गुना कम हुई है और उनकी तनों एवं शाखाओं में वह मजबूती का पूर्णतया अभाव है जो प्राकृतिक वनस्पतियों में हुआ करती है। कुछ इसी प्रकार की स्थिति गाय-भैंसों एवं उनके दूध के साथ एवं मुर्गा-मुर्गी, भेंड़-बकरी, सूअर एवं मछलियों के माँस के साथ एवं उपर्युक्त जीवों की आयु एवं मजबूती के साथ भी है। अर्थात मनुष्य ने उम्र, मजबूती एवं गुणवत्ता की कीमत चुकाकर सौन्दर्य एवं मात्रा की प्राप्ति की है। उपर्युक्त उदाहरणों के आधार पर यह स्पष्ट है कि मनुष्य ने जो मानवता के साथ विभिन्न प्रयोग किये हैं और लगातार करते जा रहा है, कम औसत आयु उसी का परिणाम है। अबतक अपनी प्राकृतिक उम्र का सौ वर्ष गँवाने के बाद भी अभी कितना और गँवाना चाहता है, यह उसके विवेक के ऊपर है और भविष्य ही बता पायेगा कि मनुष्य की अगली पीढ़ियों की औसत आयु क्या होगी। इतिहास गवाह है कि जब मनुष्यों ने गायों की प्राकृतिक जीवन शैली से छेड़छाड़ कर उनको फार्मों में पालने एवं विकसित करने का प्रयोग किया तो ‘मेउकाऊ’ नामक असाध्य एवं जानलेवा बीमारी स्वतः उत्पन्न हो गयी एवं लाखों गाय एवं कितने ही मनुष्य काल के गाल में समा गए। जब मुर्गियों के प्राकृतिक जीवन शैली से छेड़छाड़ कर उनको दड़बों में पालने का प्रयास किया गया तो ‘बर्डफ्लू’ नामक बीमारी उत्पन्न हो गयी एवं करोड़ों मुर्गियों को मारना पड़ा एवं कुछ जन-हानि भी नहीं रोकी जा सकी। अर्थात जब किसी जीव या वनस्पति की प्राकृतिक जीवन शैली से छेड़छाड़ का वृहद् रूप से प्रयास किया गया, तब-तब उनमें कोई-न-कोई असाध्य रोग महामारी के रूप में फैली एवं करोड़ों जीवों का जीवन समाप्त हुआ। मनुष्य भी इससे अछूता नहीं है, अन्तर बस इतना है कि अन्य जीवों की प्राकृतिक जीवन शैली से खिलवाड़ मनुष्य करता है परन्तु अपनी प्राकृतिक जीवनशैली से खिलवाड़ करने वाला स्वयं मनुष्य ही है। हम मनुष्यों पर इस छेड़छाड़ के असर को हाल ही में ‘सूरत के प्लेग’ के रूप में देख भी चुके हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ‘मस्तिष्क ज्वर’ एवं ‘दिल्ली के डेंगू’ से आज भी प्रतिवर्ष प्रभावित हो रहे हैं। मानवता वर्तमान में ‘शुगर’ एवं ‘ब्लडप्रेशर’ नामक दो महामारियों से बुरी तरह प्रभावित है और सम्पूर्ण विश्व भी इन महामारियों से जकड़ा हुआ है। अन्य असाध्य रोगों जैसे हेपटाइटिस, एड्स एवं कैंसर का कारक भी अप्राकृतिक जीवनशैली एवं मनुष्यों पर होने वाले नित्य नये प्रयोग ही हैं। अतः मनुष्यों पर प्रयोग शुरु करने से पूर्व उन प्रयोगों के मानवता पर असर का निष्पक्ष एवं गहराई से अध्ययन होना आवश्यक है। परन्तु ऐसा लगता है कि न तो नीति-निर्धारकों को और न ही जनमानस को कोई चिन्ता है। अभी तो हम जोर-शोर से ‘क्लोनिंग’ एवं ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ प्रयोग कर मानव जाति का नक्शा बदलने पर आमदा हैं, परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उपर्युक्त प्रयोगों से हम कम उम्र का आईन्सटाइन अथवा गैलीलियो तो शायद पैदा करने में सफल हो जाएँ परन्तु हमें उनकी उम्र, उनकी शारीरिक मजबूती एवं उनकी गुणवत्ता की कीमत चुकानी पड़ेगी। प्रयोग सृजित आईन्सटाइन एवं गैलीलियो कितने लाख रुपये प्रतिदिन की दवाओं पर जिन्दा रहेंगे यह भविष्य ही बतायेगा और उनकी उम्र कितने महीने की होगी एवं कितने कदम चलने में वे सक्षम होंगे इसका विवरण शायद कोई प्रयोगकर्ता अभी देने की स्थिति में नहीं है। रही बात मानसिक गुणवत्ता की तो वह भी समय के साथ पता लग जायेगा। पूर्वान्चल क्षेत्र इस देश का ऐसा भू-भाग है जिसपर विभिन्न रोगों एवं महामारियों का व्यापक असर देखने को मिलता है। यहाँ प्रायः नए-नए रोग उत्पन्न होते रहते हैं और सामान्यताया भी अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा यहाँ विभिन्न रोग ज्यादा प्रभावी रहते हैं और वर्ष भर इनका असर किसी न किसी रूप में बना ही रहता है। यहाँ के सामान्य आदमी के बजट का ज्यादातर भाग विभिन्न रोगों के उपचार में ही लगता है। पूर्वान्चल की प्राकृतिक परिस्थितियों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यह पूरे विश्व का एकमात्र ऐसा भू-भाग है जहाँ जाड़ा, गर्मी, बरसात एवं बसन्त लगभग बराबर समयान्तराल के होते हैं। लगभग तीन माह की अवधि तक चारों मौसम प्रभावी रहते हैं। चूँकि चारों मौसम प्रभावी रूप से इस भू-भाग पर पाए जाते हैं, अतः इनके आपस के संक्रमणकाल भी इस क्षेत्र को गहराई से प्रभावित करते हैं। ये संक्रमणकाल ही विभिन्न बीमारियों को पनपने एवं पैदा होने देने के मुख्य कारक हैं। अर्थात पूर्वान्चल में एक वर्ष में लगभग चार-पाँच बार संक्रमणकाल प्रभावी रहता है और पूरा जनजीवन इसकी चपेट में आते रहता है। ये संक्रमणकाल ही तरह-तरह की नयी-नयी बीमारियों को पैदा करने में उर्वरा भूमि का काम करते हैं। अतः इन क्षेत्रवासियों को बराबर नयी-नयी बीमारियों से भी दो-चार होना पड़ता है। यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले से लेकर बिहार की राजधानी पटना तक एवं उत्तर प्रदेश के वाराणसी से लेकर नेपाल सीमा तक फैला हुआ है। हम देखते हैं कि अगर छपरा को केन्द्र बिन्दु मानकर 200 कि॰मी॰ की त्रिज्या की एक परिधि खींचें तो इसके अन्दर के भू-भाग में लगभग एक सा मौसम, फसल, पानी, बोली इत्यादि पायी जाती है। चूँकि इस भौगोलिक क्षेत्र में ऋतुओं का संक्रमणकाल सबसे ज्यादा प्रभावी रहता है। अतः यहाँ के निवायिों को कड़े प्राकृतिक नियम संगत जीवनशैली का पालन करना अतिआवश्यक है। अन्यथा विभिन्न रोगों के चपेट में आने से उनकी कोई रक्षा नहीं कर सकता। विभिनन अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि वे ही भू-भाग नयी बीमारियों एवं महामारियों से ज्यादा प्रभावित हुए हैं अथवा नयी बीमारियाँ उन्हीं भू-भागों पर ज्यादा प्रभावी हुई है जहाँ के लोगों ने आधुनिकता के नाम पर प्राकृतिक जीवशैली का त्याग कर दिया है, जैसे दिल्ली का डेंगू, सूरत का प्लेग, महानगरों का शुगर, ब्लडप्रेशर एवं एड्स, पूर्वान्चल का मस्तिष्क ज्वर एवं एड्स इत्यादि। पूर्वान्चल के लोगों ने भी पारम्परिक जो कि प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक भी भोजन पात्रों, रहन-सहन, खानपान इत्यादि का त्याग कर एक नवीन पाश्चात्य जीवनशैली का वरण कर लिया है जिससे उनमें प्रतिरोधक क्षमता जो पारम्परिक जीवनशैली से विभिन्न पात्रों, खाद्य सामग्रियों, व्रत-त्योहारों के माध्यम से प्राप्त होती थी, खत्म हो चुकी है जिसके कारण विभिन्न महामारियाँ उनपर प्रभावी होने लगी है। अतः पूर्वान्चल के लोगों के लिए विशुद्ध प्राकृतिक जीवनशैली दीर्घ एवं रोगविहीन जीवन हेतु अनिवार्य है। ऐसा नहीं है कि इस भौगोलिक क्षेत्र में रहने वालों को सिर्फ नुकसान ही है। कुछ दुर्लभ लाभ भी हैं जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। चारों मौसमों के बराबर होने के कारण यहाँ के लोगों का मस्तिष्क काफी विकसित होता है। हम देखते भी हैं कि पूरे देश के प्रशासनिक तंत्र में इस क्षेत्र की सहभागिता सत्तर प्रतिशत से ऊपर है। परन्तु विभिन्न मौसमों के संक्रमण के असर को भी नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। यहाँ मानसिक रोगों की संभावना भी सबसे अधिक है। जहाँ अन्य क्षेत्रों में पित्त ज्वर, मलेरिया इत्यादि होते हैं वहाँ मस्तिष्क ज्वर महामारी के रूप में प्रभावी है। अतः यदि (Strict) कठिन प्राकृतिक जीवनशैली से जहाँ भी थोड़ी से भी छेड़छाड़ की जाएगी, शारीरिक रोगों के साथ-साथ मस्तिष्क रोगों से भी जनमानस त्राहि-त्राहि करने लगेगा। सम्पूर्ण ज्योतिष गणना नौ ग्रहों को आधार मानकर की गयी है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौरमण्डल के ये नौ ग्रह ही पृथ्वी के जीव-जन्तुओं के जीवन पर अपना प्रभाव डालते हैं। दूसरे शबदों में पूरी प्रकृति का संचालन इन नौ ग्रहों द्वारा ही किया जाता है या प्रकृति को नौ आयाम अथवा शक्तियाँ ही संचालित करती हैं। परन्तु सामान्यतया यह देखने को मिलता है कि अधिकांश ज्योतिषीय गणना में सत्यता के करीब तो हैं परन्तु सटीक (Aculeate) नहीं है। उनमें काफी संभवनाएँ अभी शेष रह जाती हैं। उपर्युक्त अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि पूरी सृष्टि तेरह शक्तियों से संचालित है न कि नौ से। अर्थात यदि ज्योतिष गणनाएँ भी तेरह ग्रहों के आधार पर की जाए तो शायद सारी संभावनाओं पर विराम लग जाए एवं सटीक भविष्यवाणियाँ संभव हो जाएँ। वर्तमान में नौ ग्रहों की ही खोज हो सकी है। कभी-कभी अन्य ग्रहों के खोज के बारे में भी पत्र-पत्रिकाओं में समाचार सुनाई देते हैं परन्तु अभी तक कोई (Confirm) प्रमाणित समाचार नहीं है। अभी हाल में ही दो ग्रहों के अमेरिका द्वारा खोज की खबर प्रमुखता से प्रकाशित की जा रही थी। अर्थात अभी अन्य ग्रहों के होने की संभावनाएँ उपस्थित हैं। मेरे विचार से कुल तेरह ग्रह ऐसे होने चाहिए जो पूरी प्रकृति को प्रभावित करते हैं। अर्थात कालान्तर में अभी चार अन्य ग्रह और खोजे जाएँगे। इसके उपरान्त इन नए ग्रहों के पृथ्वी एवं इसकी प्रकृति पर प्रभाव के अध्ययन के अनुसार ज्योतिषशास्त्र को परिमार्जित करना पड़ेगा, उसके बाद ही जीवों पर सटीक भविष्यवाणियाँ करना संभव पड़ेगा। अर्थात वर्तमान ज्योतिषशास्त्र में अभी और परिमार्जन की संभावना एवं आवश्यकता है। अतः जनता को नग-नगीना एवं विभिनन चैनल वालों पर अंधविश्वास करना अभी हितकर नहीं है। अगर दुनिया की प्रचलित एवं प्रभावशाली भाषाओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए तो हम पाते हैं कि सबसे ज्यादा भू-भाग पर सबसे बड़ी जनसंख्या द्वारा बोली जाने वाली भाषा अंग्रेजी में मात्र पाँच स्वर होते हैं। इसी प्रकार अरबी में ........., फारसी में ............., फ्रेंच में ............., इटैलियन में ............., चाइनीज में ............., तमिल में ............., तेलुगु में ............., लैटिन में ............., उर्दू में ............., सिंहली में ............. स्वर पाए जाते हैं। पूर विश्व में हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसमें पूरे तेरह स्वर पाए जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि यदि मनुष्य प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति है एवं पूरी प्रकृति यदि तेरह से संचालित होती है तो सम्पूर्ण मानव जाति हेतु सबसे आसान एवं प्राकृतिक भाषा तेरह स्वरों वाली हिन्दी को ही होना चाहिए। परन्तु वास्तविक धरातल पर हिन्दी एक विशेष भू-भाग पर ही रह गयी है और उसे वहाँ से भी ख्त्म करने के लिए निरन्तर प्रयास किया जा रहा है। आखिर कौन से कारण हैं कि मात्र पाँच स्वरों वाली अंग्रेजी आज दुनिया को सर्वमान्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होती जा रही है और हिन्दी अपने ही लोगों द्वारा तिरस्कृत हो रही है। जबकि प्राकृतिक नियमों के अनुसार हिन्दी को सर्वमान्य एवं मानवता की भाषा के रूप में अबतक प्रतिष्ठित हो जाना चाहिए था। हमारे हिन्दीभाषी लोगों एवं इस देश के नीति-निर्धारकों को इस विषय पर गम्भीर चिन्तर करना चाहिए और कम-से-कम अब से इस मानवता के बहुमूल्य धरोहर के प्रचार एवं प्रसार का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास सुनिश्चित करना चाहिए क्योंकि इसमें स्वमेय ऐसे गुण हैं कि यह अपने आप ही सम्पूर्ण मानवता की जुबान पर आधिपत्य कर लेगी, बस प्रयासों के शुरुआत भर की देर है। उपर्युक्त समस्त उदाहरणों के सूक्ष्म अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि मनुष्यों के जीवन का पहला परिवर्तन बारह-तेरह वर्ष की उम्र के बीच में होता है, ज्ञात ग्रहों में एक उपग्रह (चन्द्रमा) है, तेरह स्वरों में इ व ऋ लगभग समान स्वर उत्पन्न करते हैं, अर्थात ऋ पूर्ण न होकर इ का कुछ अंशों तक सहायक मात्र है। तेरह महीनों में एक माह (मलमास) चर स्वभाव का है और सम्पूर्ण प्रभावशाली न होकर पूरक स्वभाव का है अथवा आंशिक प्रभावकारी होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्रकृति का प्रभाव पूर्ण तेरह न होकर, बारह-तेरह के बीच कुछ अंश का होना प्रतीत होता है। अब प्रश्न यह है कि बारह के उपरान्त कितने और प्रतिशत प्रकृति का प्रभाव वास्तव में पड़ता है। इस पर गहन शोध की आवश्यकता प्रतीत होती है, तदुपरान्त ही स्वस्थ एवं सुखी जीवन की परिकल्पना करना संभव हो जाएगा। समस्त विकृतियों का कारण अप्राकृतिक जीवनशैली एवं निवारण प्राकृतिक जीवनशैली ही है। अतः इसका पालन करना चाहिए। सारांश के रूप में यही कहना चाहती हूँ कि मेरे विचार से सम्पूर्ण सृष्टि बारह ग्रहों एवं एक उपग्रह द्वारा संचालित होती है। मनुष्य की प्राकृतिक उम्र एक सौ छप्पन से एक सौ उनहत्तर के मध्य होती है। हिन्दी पूरी मानवता की एवं सबसे प्राकृतिक रूप से आसान भाषा है। बारह-तेरह के बीच का प्रतिशत भविष्य के शोध खुद ही निर्धारित कर देंगे एवं हिन्दी संस्कृति विश्व मान्यता की सर्वोत्तम संस्कृति है। इतिकृतम्
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Posted On:  06/Dec/2016
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
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