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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

RURAL DEVELOPMENT
 
Article Title:  ग्राम्य विकास बनाम गाँवों का शहरीकरण

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Article Content:  ग्राम्य विकास की वर्तमान समस्त सरकारी योजनाओं का लक्ष्य गाँवों को शहरों में परिवर्तन कर देने जैसा लगता है। गाँवों में मूलभूत सुविधाओं के विकास के नाम पर हम गाँवों का शहरीकरण करते जा रहे हैं। अगर यही स्थिति रही तो आगामी वर्षों में भारत से गाँवों का नामोनिशान समाप्त हो जाएगा। हमारे अधिकांश नीति-निर्धारक शहरीकरण को विकास का पर्याय मानते हैं। गौरतलब बात यह है कि अब तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि हमारा ग्राम्य विकास का स्वरूप क्या हो? शहर जैसे गाँव अथवा मूल ढाँचा परिवर्तन के बगैर विकसित गाँव? हमें यह भी ध्यान देना होगा कि गाँवों का मूल सामाजिक, आर्थिक, दार्शनिक भावों को समेटे रहने वाला गाँवों का यह देश अपनी पहचान एवं मूल भाव समाप्त कर बैठेगा। अतः ग्राम्य विकास की योजनाओं को बहुत ही सोच-समझकर एवं गहन विचार के बाद ही मूर्त रूप देना उपयुक्त होगा। शहरीकरण को विकास का पर्याय मानने वाले नीति-निर्धारकों को यह भी ज्ञान होना चाहिए कि बहुत सारी परेशानियों एवं रोगों की मुख्य वजह शहरीकरण है। शुगर, ब्लडप्रेशर, माइग्रेन इत्यादि ऐसे रोग हैं जो शहरीकरण की उपज हैं, जिनकी परिणिति हृदयाघात, पक्षाघात इत्यादि के रूप में होती है एवं यदि त्वरित चिकित्सा एवं विकसित चिकित्सा उपकरण उपलब्ध नहीं हैं तो जनहानि अवश्यंभावी है। ऐसी परिस्थिति में नीति-निर्धारकों को यह बात अवश्य ध्यान रखनी चाहिए कि गाँवों के शहरीकरण के फलस्वरूप स्वतः स्फूर्त इन आकस्मिक रोगों के उपचार से ग्रामीण जनता को बचाने की किस कार्य योजना का समावेश उनके द्वारा ग्राम्य विकास की योजना में किया गया है? अथवा जब गाँव शहर का रूप ले लेंगे तो विभिन्न आकस्मिक रोग गाँवों में भी पैदा हो जाएँगे, जिनका त्वरित एवं विकसित उपचार आवश्यक होगा, ऐसी स्थिति में उनकी योजना में किस स्तर के चिकित्सालयों की योजना प्रत्येक गाँव हेतु उनके द्वारा बनायी गयी है? गाँवों में सबसे सशक्त पक्ष ग्रामवासियों में परस्पर प्रगाढ़ सामाजिक संबंध का पाया जाना होता है। सर्वविदित है कि कोई भी सामाजिक संबंध तभी अक्षुण्ण रह सकता है जब वह एक निश्चित अन्तराल में लगातार नवीनीकृत होता रहे। अगर हम ग्रामीण जीवन का गौर से अध्ययन करें तो यह पाते हैं कि प्रत्येक ग्रामीण का अपने प्रत्येक ग्रामवासी से प्रतिदिन सुबह-शाम अवश्य ही मिलन हो जाता है। अर्थात ग्रामवासियों में सम्बन्धों का नवीनीकरण प्रतिदिन की आवृति से होता है जो ग्रामीणों में परस्पर मजबूत सामाजिक संबंध का मूल आधार है। यह प्रतिदिन का नवीनीकरण गाँवों में नित्यक्रिया हेतु निश्चित एक विशेष क्षेत्र की वजह से स्वतः ही सम्भव हो जाता है। प्रत्येक गाँवों में स्त्री एवं पुरुषों हेतु एक निश्चित घाट या क्षेत्र नियत होते हैं और नियत घाट अथवा क्षेत्र में ही प्रत्येक ग्रामवासी सुबह-शाम निश्चित रूप से जाता है। नित्यक्रिया का समय भी प्रत्येक ग्रामवासी का लगभग समान ही होता है। अतः परस्पर मिलन स्वतः ही होना अवश्यंभावी है। हमारे नीति-निर्धारक प्रत्येक घर में शौचालय का मॉडल अमल में ला रहे हैं। ऐसी स्थिति में गाँव की मजबूत सामाजिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। मेरे विचार से स्त्री-पुरुषों हेतु नियत घाटों या क्षेत्रों में ही किसी उपयुक्त स्थान पर सुलभ कॉम्पलेक्स जैसी कोई योजना लाना ज्यादा हितकर होगा। विकास भी हो जाएगा और सामाजिक संबंध भी अक्षुण्ण रहेंगे। यह एक तथ्य है, ऐसे ही अनेक तथ्यों पर, जो ग्राम्य जीवन की रीढ़ हैं, पर नीति-निर्धारकों को विचार करना आवश्यक होगा, अन्यथा वे विकास के नाम पर ग्राम्य जीवन एवं ग्रामीणों के जीवन का सत्यानाश कर बैठेंगे। प्रत्येक घर में शौचालय की योजना भूजल को शहरों की भाँति प्रदूषित कर देगी जिसकी वजह से शहरी रोग- ऐसीडिटी, गैस, शुगर, ब्लडप्रेशर गाँवों में प्रवेश कर जाएँगे। अल्प आय वर्ग के ग्रामीण प्रतिदिन एवं आजन्म चलने वाली दवाओं का खर्च नहीं उठा सकेंगे, जिसका नतीजा बड़ा भयावह होगा। उच्च चिकित्सा सुविधा गाँवों में उपलब्ध होना तो असम्भव है। अतः यह ग्राम विकास का शहरीकरण मॉडल भारतवर्ष से गाँवों एवं ग्रामीणों का नामोनिशान मिटा देगा। ग्रामीण विकास का दूसरा सशक्त माध्यम हमारी सांस्कृतिक गतिविधियाँ हैं। ग्रामीण सामूहिक रूप से हमारी सांस्कृतिक विरासत को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया करते हैं। ये सांस्कृतिक गतिविधियाँ विभिन्न तीज-त्योहारों के रूप में वर्ष भर में कई बार मनाई जाती हैं। अधिसंख्य गतिविधियों का स्थान प्रत्येक गाँव में नियत रहता है। यदि ग्राम्य विकास के मॉडल में इन सांस्कृतिक गतिविधियों एवं उनके नियत स्थानों के संवर्धन एवं विकास की योजना नहीं अमल में लायी जायेंगी, तो सम्पूर्ण सांस्कृतिक गतिविधियाँ ठीक उसी प्रकार टेलीविजन में समाहित होकर रह जायेंगी, जिस प्रकार हमारे राष्ट्रीय पर्व, स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस में समाहित हो गये हैं। सांस्कृतिक गतिविधियाँ ग्रामीण एकता, आपसी सहयोग एवं मजबूत सामाजिक सोच का ठोस आधार हैं। अतः ग्राम्य विकास के मॉडल में इनका अनिवार्य रूप से संवर्धन एवं विकास की योजना तैयार होना आवश्यक है। सांस्कृतिक धरोहरों का विनष्ट होना ग्राम्य ही नहीं, राष्ट्रवाद के लिए भी खतरनाक हो सकता है। अतः गाँव का प्रत्येक वह स्थान, जहाँ पर कोई भी सांस्कृतिक आयोजन किया जाता रहा हो, उसके विकसित करने का निश्चित प्रावधान करने की अति आवश्यकता है। सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधियों की भाँति ही धार्मिक गतिविधियाँ भी ग्रामीण जीवन में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं और ग्रामीण जीवन में सामाजिक एकता की मजबूत आधार स्तम्भ हैं। विभिन्न सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियाँ, धार्मिक गतिविधियों की छाया में संचालित होती हैं। अतः ग्राम्य जीवन के सर्वांगीण एवं बुनियादी विकास की परिकल्पना में धार्मिक गतिविधियों का संवर्धन एवं अक्षुण्णता का समावेश अतिआवश्यक है। इन धार्मिक गतिविधियों के भी प्रत्येक ग्राम में निश्चित स्थान हैं, जहाँ परम्परागत रूप से ये संचालित होती आ रही हैं। अतः वास्तविक ग्राम्य विकास हेतु इन निश्चित स्थानों, स्मारकों एवं परम्पराओं के विकास एवं संवर्धन की योजना का भी ग्राम्य विकास में महत्वपूर्ण स्थान है। नीति-निर्धारक को इस बात का भी ध्यान रखना काफी महत्वपूर्ण होगा। मनोरंजन का ग्रामीण जीवन में एक अपना विशेष एवं महत्वपूर्ण योगदान है। पुरुष वर्ग का मुख्य साधन चैता, फगुआ, कीर्तन, खेलकूद, कुश्ती इत्यादि के माध्यम से, तो महिलाओं का कजरी, लचारी, गारी, विवाह गीत, देवी गीत इत्यादि के माध्यम से होता है। चैता, फगुआ पुरुषों के, तो पीड़िया (गोवर्धन) महिलाओं के मनोरंजन के मुख्य साधन हैं। अतः ग्राम्य जीवन के मानसिक स्वास्थ्य हेतु विभिनन मनोरंजन के साधनों का संवर्धन एवं उनके नीयत स्थानों के विकसित करने का प्रावधान निश्चित रूप से करना अनिवार्य होगा। अगर शहरीकरण के मॉडल पर ग्राम्य विकास किया जाएगा और टी॰वी॰ ही एकमात्र मनोरंजन का विकल्प होगा तो एक तो हमारी सांस्कृतिक धरोहर नष्ट हो जाएगी, दूसरे मोटापा, शुगर, ब्लडप्रेशर, विभिन्न नेत्र रोग हमारी ग्रामीण जनता को जकड़ लेंगे जिसके उपचार पर होने वाले खर्च का बोझ, अल्प आय वाली ग्रामीण जनता के लिए असम्भव होगा। सारी सकारात्मक बातों के बावजूद हमारा ग्रामीण भारत आज भी छुआछूत, धार्मिक भेदभाव, जातीय भेदभाव से पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाया है। ग्रामीण भारत का यह एक महत्वपूर्ण घिनौना सत्य है। अतः ग्राम्य विकास के मॉडल में इस कटु सत्य का ध्यान रखना एवं ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना अनिवार्य है जिससे वर्ग संघर्ष, धर्म संघर्ष को रोका जा सके। अतः सामाजिक केन्द्रों, धार्मिक केन्द्रों, मनोरंजन केन्द्रों एवं सांस्कृतिक केन्द्रों, क्रीड़ालयों का विकेन्द्रीकरण कर विकसित करने का प्रावधान वर्तमान परिस्थितियों में आवश्यक है। एक ही घाट पर सवर्ण एवं अछूत नित्यक्रिया, स्नान, मनोरंजन, खेलकूद, सांस्कृतिक एवं धार्मिक आयोजन सम्पन्न करने की मानसिक अवस्था वर्तमान में नहीं है। अतः सवर्णों एवं अछूतों हेतु अलग स्थान एवं कक्षों की व्यवस्था वर्तमान समय में आवश्यक है। वर्तमान में गाँवों में स्थायी एवं सुलभ चिकित्सा व्यवस्था का पूर्णतया अभाव है। कुछ गाँवों में चिकित्सालय तो अवश्य खुले हैं, परन्तु वहाँ चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं। इन चिकित्सालयों में चिकित्सक एवं अन्य कर्मचारी यदा-कदा जाँच इत्यादि के समय दिखाई देते हैं। ऐसी दशा में गाँवों के शहरीकरण के पूर्व मजबूत एवं स्थायी चिकित्सा व्यवस्था के बारे में हजार बार विचार करना आवश्यक है। मेरी उपर्युक्त तथ्यों के स्पस्ट करने के प्रति आशय मात्र इतना है कि अगर ग्राम्य विकास गाँवों की मूल सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक मूल संरचना को अक्षुण्ण रखते हुए की जाए तो वह विकास का मॉडल गाँवों के शहरीकरण के मॉडल की अपेक्षा ज्यादा प्राकृतिक, स्थायी एवं वैज्ञानिक होगा। गाँवों का वर्तमान समय में सबसे कमजोर पक्ष चिकित्सा व्यवस्था एवं निम्नतम प्रति व्यक्ति आय है। अतः विकास के मॉडल में चिकित्सा व्यवस्था का सुदृढ़िकरण एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की योजना का बहुत ही सोच-विचार कर समावेश करना अति आवश्यक होगा और यह भी सुनिश्चित करना पड़ेगा कि हर हाल में गाँव की मूल मनोवैज्ञानिक संरचना ध्वस्त न होने पाए।
Article Subject: 
Posted On:  15/Mar/2017
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
Article Id: 
Article Title:  भारतीय परिदृश्य और उद्योग नीति

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Article Content:  कृषि प्रधान देश भारत की परिस्थितियों और उद्योग नीति में तालमेल समझ से परे है। भारत की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी के रूप में सामने है और दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। सवा अरब की आबादी वाले देश में जब तक हमारी परिस्थितियों के अनुरूप उद्योग-नीति नहीं बनायी जाती, तब तक इस देश से बेरोजगारी को नियंत्रित करना असंभव होगा। भारतीय उद्योग नीति मूलतः पश्चिमी देशों की नीतियों पर आधारित है जिसमें मशीनीकरण की प्रमुखता है और श्रम शक्ति गौण है। यह नीति पश्चिमी देशों के लिए उपयुक्त है क्योंकि वहाँ की आबादी बहुत कम है। अतः वहाँ पर मैनपावर पर निर्भर नहीं रहा जा सकता और मशीनीकरण ही विकल्प है, जबकि हमारे देश में मैनपावर बहुत ही ज्यादा है। अतः यहाँ ज्यादा मशीनीकरण बेरोजगारी में बेतहासा वृद्धि करेगा। अतः उद्योगनीति में मशीनीकरण का प्रयोग कम से कम करना राष्ट्रीय हित में होगा। पड़ोसी देश चीन की उद्योग नीति, पश्चिमी उद्योग नीति के ठीक विपरीत है। परन्तु वह चीन की परिस्थितियों से एक दम तालमेल बैठाकर लागू की गयी है। चीन की आबादी भी भारत जैसे बहुत अधिक है, परन्तु वहाँ के नीति निर्धारकों ने अपनी परिस्थितियों से साम्य बैठाने वाली उद्योग नीति बनायी जिसमें मानवशक्ति का प्रयोग ज्यादा एवं मशीनीकरण का प्रयोग कम किया जाता है जिसकी वजह से वहाँ बेरोजगारी एवं भ्रष्टाचार पनपने नहीं पाए, जबकि हमारे देश में यह विकराल रूप लेते जा रहे हैं। यह हमारी पश्चिमी उद्योग नीति के अन्धानुकरण का प्रतिफल है कि हम बेरोजगारी एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं जबकि हमारा पड़ोसी चीन महाशक्ति के रूप में स्थापित होने के कगार पर पहुँच चुका है। चीन की उद्योग नीति का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वह पश्चिमी देशों की नीतियों के ठीक विपरीत नो गारण्टी, नो वारण्टी सामान तैयार करता है जबकि सभी पश्चिमी देश गारण्टी एवं वारण्टी वाले सामान तैयार करते हैं। चीन की यह नीति भी वहाँ की परिस्थितियों से सटीक मेल खाता है। नो गारण्टी, नो वारण्टी सामानों की कीमत पश्चिमी देशों के सामानों के सापेक्ष बहुत कम होती है, दूसरे टिकाउपन न होने की वजह से जल्दी-जल्दी खराब हो जाते हैं जिससे बाजार में उनकी माँग लगातार बनी रहती है। लिहाजा मानवशक्ति के पास हमेशा काम उपलब्ध रहता है। पश्चिमी देशों के सामानों के सापेक्ष अल्प कीमत भी ग्राहकों को बार-बार चीनी सामान खरीदने में सहयोगी रहती है। अतः भारतीय उद्योग नीति में भी मानवशक्ति एवं मशीनीकरण का तालमेल अपनी परिस्थितियों के अनुसार बैठाने का प्रयास करना फायदेमंद साबित होगा। हमारे देश के अधिसंख्य क्षेत्र में एक परिवार के पास औसतन एक एकड़ के करीब कृषि योग्य भूमि है। अभी भी हमारे यहाँ ज्यादातर संयुक्त परिवार का ही प्रचलन है और औसतन एक परिवार में 20 की आबादी है जो पूर्ण या आंशिक रूप से कृषि पर ही आश्रित है और कृषि कार्य में ही लगी है। एक एकड़ भूमि हेतु चार से छह लोगों की ही आवश्यकता है। शेष लोग रोजगार के अभाव में कृषि कार्य से जुड़े हैं। अर्थात मानवशक्ति का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। दूसरे शब्दों में हमारे परिवार को चौदह लोग यानी लगभग साठ से सत्तर प्रतिशत मानवशक्ति सरप्लस है, जो छह लोगों की कमाई खा रहे हैं। अर्थात जो कार्य चालीस प्रतिशत मानवशक्ति से कराया जा सकता है उसी कार्य में सौ प्रतशत मानवशक्ति संलग्न है और उत्पादन को हजम कर रही है। इस साठ प्रतिशत मानवशक्ति का प्रयोग उद्योग नीति बनाकर किया जा सकता है। इस प्रकार हमारे देश की साठ प्रतिशत आबादी अनुत्पादक है या यह कहें कि हमारी साठ प्रतिशत आबादी के पास उत्पादन के अवसर ही नहीं है जो हमारी सबसे बड़ी समस्या है क्योंकि यह साठ प्रतिशत अनुत्पादक आबादी चालीस प्रतिशत की उत्पादकता भी हजम कर जा रही है और यह देश-विश्व का सबसे बड़ा आयातक बनने का अभिशप्त है। ये हमारी नीतियों का दुष्परिणाम है जबकि हमारा पड़ोसी देश चीन में यह अन्तर लगभग नगण्य है और वह विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक बनने की होड़ में है। मेरे विचार से इस अन्तर को ब्लॉक स्तर पर औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित करने की नीति बनाकर पाटा जा सकता है जिससे कृषि क्षेत्र की सरप्लस साठ प्रतिशत मानवशक्ति का सदुपयोग किया जा सके और उन्हें अनुत्पादक से उत्पादक की श्रेणी में लाया जा सके। इसके बाद ही हम निर्यातक देशों की श्रेणी में शामिल हो पाएँगे, अन्यथा बेरोजगारी एवं भ्रष्टाचार हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। प्रत्येक ब्लॉक पर लघु इकाइयाँ और जिला स्तर पर भारती औद्योगिक इकाइयों की स्थापना कर हम लाखों रोजगार के अवसर पैदा करने में सक्षम हो पाएँगे और हमारी साठ प्रतिशत सरप्लस आबादी को रोजगार के अवसर प्राप्त हो जायेगा। इस प्रकार हम आयातक देश से हटकर निर्यातक देश की श्रेणी में आ जाएँगे। स्थिर विकास दर के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी है एवं राजनीतिक स्थिरता हेतु बेराजगारी पर नियंत्रण, दुनिया के सारे विकसित देश अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार उद्योग नीति बनाते हैं जबकि हम नकल पर विश्वास करते हैं, वो भी बिना अपनी परिस्थितियों के अध्ययन के। कृषि प्रधान देश की उद्योग नीति भी नकल की शिकार हो गयी है। हमने बिना सोचे-समझे पश्चिमी उद्योग-नीति भी, जिसमें कृषि आधारित उद्योगों में भारी मशीनों का प्रयोग किया जाता है कि नकल कर ली हैं, जबकि हमारी आबादी और उनकी आबादी में जमीन-आसमान का अन्तर है, जिसका नतीजा बेराजगारों की फौज के रूप में हमारे सामने है। हमारे देश का चीनी उद्योग, कपड़ा उद्योग, चावल उद्योग, कल संरक्षण उद्योग सब-के-सब भारती स्वचालित मशीनों द्वारा संचालित हो रहे हैं। समस्त औद्योगिक उपकरण बनाने वाले देश माँग के अनुसार मशीनों का निर्माण करते हैं। जब हम उनसे उनके देशों में प्रयोग किये जा रहे उपकरणों की ही माँग करेंगे तो उन्हें क्या पड़ी है कि हमारी परिस्थितियों के अनुरूप उपकरणों को बनाने की। अगर हम चीनी मिलों का ही उदाहरण लेें तो यह पाते हैं कि भारी-भरकम चीनी मिलों में बहुत कम मानवशक्ति का प्रयोग होता है। उनका रख-रखाव भी नहीं हो पा रहा है। ज्यादातर मिलें तो गन्ने की कम आपूर्ति की वजह से ही बन्द हो गयी हैं या साल में एक-दो माह ही चल पा रही हैं। अर्थात ये भारी-भरकम मिलें न तो चल पा रही हैं और न ही हमारी बेरोजगारी ही दूर कर पा रही हैं। अर्थात नीतिगत एवं व्यावहारिक धरातल पर यह पूर्णतया असफल ही साबित हुई है। हमारी मुख्य समस्या बेरोजगारी है। अतः हमारी नीतियाँ रोजगार के अवसर उत्पन्न करने वाली होनी चाहिये। अतः भारी मशीनों के प्रयोग की बजाय इनके सूक्ष्मीकरण अथवा विखण्डीकरण पर हमें विचार करना चाहिए। मशीन बनाने वाले देश हमारी माँग के अनुसार ही उपकरणों एवं मशीनों का निर्माण करते हैं क्योंकि हमारे जैसे वे अपनी आबादी को वे बेरोजगार नहीं रख सकते। हम जैसा माँग करेंगे, वैसे ही उपकरण वो बनाना शुरू कर देंगे। अगर चीनी मिलों, शीतगृह की मशीनों, चावल एवं आटा निर्माण की मशीनों का सूक्ष्म मॉडल तैयार हो जाए तो उसकी कीमत चार-पाँच लाख रुपये से अधिक नहीं आएगी और हमारे प्रत्येक गाँव में चीनी मिल, दाल मिल, आटा मिल, शीतगृह, चावल मिलें स्थापित हो जाएँगी जिससे हमारी साठ प्रतिशत सरप्लस अनुत्पादन, आबादी को रोजगार मिल जायेगा और हम बहुत जल्द निर्यातक की श्रेणी में शुमार हो जाएँगे। दूसरा विकल्प विखण्डीकरण का है जिसमें भारी-भारी मशीनों के कार्यों को अलग-अलग करने वाली मशीनों का निर्माण है, जैसे एक भारी चीनी मिल की बजाय हम गन्ने से रस निकालने वाली मशीन अलग, रस को गर्म करके पेस्ट बनाने वाली मशीन अलग, पेस्ट से ओछा अलग करने वाली मशीन अलग, पेस्ट को साफ करने वाली मशीन को अलग एवं अन्तिम इकाई के रूप में दानेदार चीनी का रूप देने वाली मशीन को अलग मशीनों के रूप में विकसित कर लें तो इसमें से कुछ इकाइयाँ ग्राम स्तर पर, कुछ ब्लॉक स्तर पर तथा कुछ तहसील एवं जिला स्तर पर स्थापित हो जाएगी जिससे भारी उत्पादकता के साथ-साथ लाखों रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। इस प्रकार हम उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ बेरोजगारी नियंत्रित करने में भी कामयाब हो जाएँगे। ऐसी ही नीतियाँ हम अन्य कृषि आधारित उद्योगों में भी लागू कर बेरोजगारी का पूर्णतया उन्मूलन करने में कामयाब हो सकते हैं। हमारे देश की वर्तमान आवश्यकता उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार के अवसर उत्पन्न करना है। अतः हमें सूक्ष्मीकरण एवं विखण्डीकरण पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए एवं सरप्लस मानवशक्ति को औद्योगिक क्षेत्र में उपयोग करना चाहिए। इसके लिए ग्राम स्तर, ब्लॉक स्तर, तहसील स्तर एवं जिला स्तर पर औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित कर ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसर उत्पन्न करना चाहिए जिससे सरप्लस एवं अनुत्पादक आबादी को काम मिल सके एवं उनका सदुपयोग हो सके। अन्यथा चालीस प्रतिशत की उत्पादकता साठ प्रतिशत खाते रहेंगे और यह देश आयातक से याचक हो जाएगा और अन्य देशों से खाद्य पदार्थों की भीख माँगने पर विवश हो जाएगा। हमें उपकरणों एवं मशीनों के प्रयोग में सावधानी बरतनी चाहिए एवं यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि ये भारी मशीनें कहीं हमारी मानवशक्ति को बेरोजगार तो नहीं कर देंगी। हमें अल्प आबादी वाले देशों की औद्योगिक नीतियों एवं मशीनों के अन्धानुकरण से बचना चाहिए एवं उन मशीनों में अपनी परिस्थितियों के अनुसार सूक्ष्मीकरण अथवा विखण्डीकरण के उपरान्त ही प्रयोग में ले आना चाहिए। सही नीतियों के चयन द्वारा हम भारतीय भी विश्वशक्ति को रेस में शामिल हो सकते हैं।
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Posted On:  13/Dec/2016
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
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COMMENTS:
 
Barnypok  Says: Hcqfhn http://www.LnAJ7K8QSpkiStk3sLL0hQP6MO2wQ8gO.com
ON: 31/03/17
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ON: 21/09/10
Kailash Kuril  Says: It is nice article & well description of our culture & nature
ON: 12/09/10
hareram  Says: this is vacant
ON: 05/08/10
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