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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

 

SOCIAL
 
Article Title:  एक प्रयास

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Article Content:  दिसम्बर 9 के प्रथम सप्ताह में हमलोगों को सपरिवार मेरे पति के अभिन्न मित्र की लड़की की शादी में शरीक होने जाना था। श्री अरविन्द सिंह जी मेरे पति के बचपन के साथी एवं उनके संघर्ष के दिनों के सहयोगी हैं। इसमें शरीक होने के लिए वे ठीक वैसे ही उत्साहित थे जैसे शायद वे अपनी लड़की की शादी में होंगे। ठीक उसी दिन गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष श्री श्रीकान्त मिश्र जी के गाँव पर एक समारोह आयोजित था जिसके मुख्य अतिथि मेरे पति ही थे। श्री अरविन्द सिंह के यहाँ शादी अचानक तय हो गयी थी, अतः निमंत्रण की सूचना श्रीकान्त जी के आमंत्रण के बाद प्राप्त हुई। श्रीकान्त जी से क्षमा-याचना की गयी परन्तु उनका कहना था कि कार्ड बँट चुका है। सभी तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी हैं, अब समारोह टालना सम्भव नहीं है। दिक्कत यह थी कि दोनों स्थानों में काफी दूरी थी। श्री मिश्र का घर कुशीनगर जनपद के सेवरही ब्लॉक में है, तो श्री सिंह का घर देवरिया जनपद के भागलपुर ब्लॉक में। मेरे पति अपने मित्र के यहाँ दोपहर तक पहुँच जाना चाहते थे। खैर अब पहले से समय दे देने की विवशता कहिये या श्री मिश्र का स्नेह बंधन, वे दोनों जगह के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गए थे। सुबह-सुबह ही सबको तैयार कर नियत समय से हमलोग श्री मिश्र के घर के लिए चल दिये। मेरे पति, जो सामान्यतः सबसे देर में तैयार होते हैं, उस दिन सबसे पहले ही तैयार हो गए और सबको तैयार करने लगे थे। यात्रा सामान्य रही, हमलोग श्री मिश्र के घर बिना कहीं रूके सीधे पहुँच गए। सेवरही कस्बे में थोड़ी दिक्कत जरूर हुई परन्तु श्री मिश्र का पता बताने के बाद वह भी दूर हो गयी, लोगों ने आसानी से रास्ता बता दिया। हमलोग नियत समय से पूर्व ही समारोह स्थल पर पहुँच गए। वहाँ सारी तैयारियाँ पहले ही हो गयी थीं। काफी संख्या में लोग भी आ गए थे। एक बात जो मुझे खटक रही थी वो यह थी कि जो बच्चे यहाँ बैठे थे, उनके पास डेªस तो दूर, ढंग का कपड़ा भी नहीं था। काफी बच्चे बिना जूते-चप्पल के थे। अध्यापक लोग जरूर सामान्य कपड़े-लत्ते में थे। श्री मिश्र जी ने हमलोगों को अपना विद्यालय दिखाया, वो भी उन बच्चों की तरह था। न ढंग के कमरे, न फर्नीचर, न ब्लैकबोर्ड, न अन्य कोई सुविधा। परन्तु मेरे पति बड़ी रुचि से सारी चीजें देख रहे थे एवं श्री मिश्र की सराहना किये जा रहे थे। मेरे बच्चे भी कह रहे थे- ‘यहाँ कैसी पढ़ाई होती है? ये कैसे बच्चे हैं? ये किस प्रकार यहाँ पढ़ाई करते होंगे?’ खैर, हमलोग स्कूल से लौटकर समारोह स्थल पर आए अतिथिगण प्रो॰ सी॰पी॰एम॰ त्रिपाठी, ई॰ श्री एस॰पी॰ सिंह (एन॰ई॰ रेलवे), श्री अजय तिवारी एवं श्री विजय राय (प्रमुख, सेवरही) आ चुके थे। समय देखकर मैंने अपने पति से पूछा तो पता चला कि श्री मिश्र गरीब बच्चों के लिए बिना फीस वाला स्कूल चलाते हैं। यह सुनकर मेरी एवं बच्चों की उत्सुकता कुछ बढ़ी। मेरे पति के आग्रह से कार्यक्रम नियत समय से ही शुरू हो गया। कार्यक्रम का विषय था ‘समाकेतिक विकास में स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका’। वक्ताओं ने काफी कुछ बोला, कुछ विषय पर तो कुछ क्षेत्रीय समस्याओं पर। श्री संजय मिश्र ने ‘स्वयंसेवी संस्थाओं के दायित्व एवं स्वयंसेवी किसे कहते हैं’ पर अच्छा व्याख्यान दिया। मेरे पति, जो पेशे से अभियन्ता हैं, का दृष्टिकोण कुछ अलग था। उन्होंने देश में उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि बिना उत्पादकता बढ़ाए देश का समाकेतिक विकास नहीं हो सकता। उनके अनुसार आजकल का युवा वर्ग सेवाक्षेत्र की तरफ भाग रहा है जबकि सेवाक्षेत्र वहीं बढ़ेगा जहाँ उत्पादन क्षेत्र प्रभावी होगा। सेवाक्षेत्र के बल पर समाकेतिक विकास की नींव नहीं रखी जा सकती। मेरे पति ने कहा कि आज उत्तर प्रदेश एवं बिहार का सक्षम वर्ग सेवाक्षेत्र की तरफ आकर्षित है और यही इस क्षेत्र के पिछड़ेपन की मूल वजह है, क्योंकि अन्य वर्ग के युवा सक्षम वर्ग का अनुसरण करते हैं। चूँकि सक्षम वर्ग सेवाक्षेत्र को वरीयता दे रहा है और उत्पादन क्षेत्र से भाग रहा है, अतः अन्य वर्ग भी देखादेखी उत्पादन क्षेत्र के बजाय सेवाक्षेत्र को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने विभिन्न प्रान्तों एवं देशों के सक्षम वर्ग एवं उत्पादकता में उनकी भागीदारी का उदाहरण भी दिया। तदुपरान्त गोरखपुर विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो॰ सी॰पी॰एम॰ त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में वर्मी कम्पोस्ट की उपादेयता एवं मधुमक्खी पालन का बड़ा ही सार्थक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की तरफ से निःशुल्क तकनीकी प्रशिक्षण एवं केंचुए भी उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। सभा के अन्त में श्रीकान्त मिश्र ने सभी आगन्तुकों का आभार व्यक्त किया। सभा के तुरन्त बाद हमलोग प्रस्थान कर दिये। यात्रा काफी थकाऊ थी। रास्ता बहुत ही खराब था जिसकी वजह से काफी विलम्ब हो रहा था। किसी तरह हमलोग शाम को सात बजे श्री अरविन्द जी के घर पहुँचे। श्री सिंह ने गाँव में भव्य आयोजन किया था। ऐसे आयोजन की कल्पना गाँवों में अमूमन नहीं हो पाती। हर एक चीज काफी शौक से एवं सलीके से की गयी थी। बारात थोड़ी देर में आने वाली थी। वहाँ अपार भीड़ पहले ही मौजूद थी। बहुत ही शानदार बिजली की सजावट थी। पूरा परिसर राजमहल जैसे चमक रहा था। मेजबान पक्ष भागदौड़ कर व्यवस्था में मशगूल था। भीड़ की वजह से लगभग आधा घण्टा बाद हमलोगों की मुलाकात श्री सिंह से हुई। शायद वे किसी संस्कार में व्यस्त थे। परिसर में ऐसी व्यवस्था थी कि शहर और गाँव का अन्तर मिट गया था। शानदार मण्डप सजाया गया था। स्टेज तो मानो किसी राजसिंहासन जैसा दमक रहा था। ऐसी व्यवस्था गाँवों की बात तो छोड़ ही दीजिये, शहरों में भी कम ही देखने को मिलती है। थोड़ी देर में गाजे-बाजे के साथ बारात भी आ गयी। काफी धूम-धड़ाका हो रहा था। बाराती नाचते-गाते आगे बढ़ रहे थे। पूरे गाँव के लोग एवं मेजबान पक्ष स्वागत हेतु आगे बढ़ा। महिलाएँ छतों से बारातियों का नाच-गाना, हाथी, ऊँट, घोड़ा, बैण्ड-बाजा देख रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो कोई राजा की सवारी आगे बढ़ रही हो। द्वारपूजा का संस्कार पूर्ण होने के बाद जलपान शुरू हुआ। जलपान में शायद ही ऐसा कोई व्यंजन हो जो वहाँ उपलब्ध नहीं था। तदुपरान्त जयमाल का कार्यक्रम शुरू हुआ। स्टेज पर दूल्हा-दुल्हन ऐसे दमक रहे थे जैसा अक्सर फिल्मों में दिखता है अथवा हमारी कल्पनाओं में राजशाही के समय की याद के रूप में विद्यमान है। श्री सिंह ने लड़का बहुत ही सुन्दर, एकदम राजकुमार जैसा चयनित किया था, लड़की तो उनकी राजकुमारी जैसी थी ही। स्टेज का कार्यक्रम चारों तरफ के विभिन्न पण्डालों में बड़े-बड़े पर्दों पर प्रसारित हो रहा था। धराती-बाराती दोनों डीजे की धुनों पर नाच रहे थे। श्री सिंह के छोटे भाई श्री अशोक सिंह जी सबसे आगे थे। वे लोगों को पकड़-पकड़ कर नचवा रहे थे एवं स्वयं उनके नृत्य की तो बात ही मत पूछिये। अशोक जी ने मेरे पति को भी पकड़ लिया और काफी देर तक उनसे भी उल्टे-सीधे, जैसे-तैसे ठुमके लगवाए। तदुपरान्त हमलोग भोजन हेतु दूसरे पण्डाल की तरफ बढ़े। बच्चे इतने प्रसन्न एवं मशगूल थे कि जाने का नाम ही नहीं ले रहे थे। वहाँ की व्यवस्था भी अन्य व्यवस्थाओं जैसी ही भव्य थी। काफी लम्बा पण्डाल था। यह पता लगा पाना कि कहाँ पर कौन-सा व्यंजन उपलब्ध है, असम्भव-सा लग रहा था। श्री पप्पू सिंह हम लोगों का संकोच भाँप गए और हमलोगों की मदद करने लगे। मेरे पति सबसे आगे प्लेट लेने बढ़े। वहाँ कुछ युवतियाँ खड़ी थीं, जब वे वहाँ पहुँचे तो एक युवती ने प्लेट इनकी तरफ बढ़ा दिया। मेरे पति बोले- ‘अरे आप लीजिये, हम ले लेंगे, हमलोग ज्यादा हैं।’ युवती कुछ समझ नहीं पायी और प्लेट लेने का पुनः आग्रह किया, पति महोदय ने पुनः वही जवाब दिया। तबतक श्री पप्पू सिंह जी निकट आ गये और युवती से प्लेट लेकर मेरे पति को दिया और उस युवती को और प्लेट लाने को कहा। मेरे पति तो उस क्षण कुछ नहीं समझे, परन्तु जब श्री सिंह ने कहा कि ‘क्यों नहीं प्लेट ले रहे थे, ये सब इसी काम के लिए ही तो आयी हैं।’ तब मेरे पति बुरी तरह झेप गए और मैं और बच्चे हँसने लगे। खैर, हमलोगों ने छक कर भोजन किया और श्री अरविन्द सिंह जी से अनुमति लेकर गोरखपुर हेतु प्रस्थान कर गए। पूरे रास्ते भर पति महोदय अपनी प्लेट वाली बात की सफाई देते रहे और बच्चे हँसते रहे। जब हमलोग चौरीचौरा पहुँचे तो देखा सड़क के किनारे सैकड़ों भैंस की पड़ियाँ बँधी थी और कुछ लोग वहाँ खड़े थे। मैंने पति से पूछा कि यहाँ पड़ियाँ क्यों बाँध कर रखी गयी हैं? उन्होंने बताया किया कुछ व्यापारी लोग इन्हें यहाँ बेचने के लिए लाते हैं। उन्होंने यह भी बताया किया हजार-पाँच सौ में किसान इन्हें खरीद लेते हैं और पालते हैं। हमलोग उस दिन लगभग एक बजे के आस-पास घर पहुँचे और सो गये। अगले दिन सुबह बच्चे स्कूल चले गए और पति महोदय अपने समय से ऑफिस। मैं घर का कामकाज निपटाकर धूप में बैठ गयी। मेरे मन में बार-बार श्री मिश्र का स्कूल और उन बच्चों के चेहरे याद आ रहे थे। मैं उन बच्चों की कुछ सहायता करने की सोचने लगी। साथ में मेरे मस्तिष्क में वहाँ चल रही गोष्ठी में हुए वार्तालाप गूँज रहे थे। उत्पादकता, स्वावलम्बन, वर्मी कम्पोस्ट, मधुमक्खी पालन, स्वयंसेवी इत्यादि शब्द एवं उनको बोलने वाले लोगों के चेहरे, जनता की प्रतिक्रिया, बच्चों की उत्सुकता इत्यादि सब मेरे मस्तिष्क में फिल्म की तरह चल रहे थे। काफी देर तक मैं उधेड़बुन में पड़ी रही, सोचती रही, परन्तु कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। बीच-बीच में श्री सिंह के यहाँ की शादी समारोह की बातें भी याद आ रही थीं। सोचते-समझते मैं बोर हो गयी, धूप भी कम होने लगी थी और हवा चलने लगी थी। मैं कमरे के अन्दर आ गयी और लेट गयी। बच्चों के आने का समय भी होने वाला था। मैं उनके खाने-पीने के बारे में लेटे-लेटे सोचने लगी। तभी अचानक मेरा ध्यान चौरीचौरा में बिक रही भैंस की पड़ियों की तरफ गया। पति के शब्द मेरे कानों में गूँजने लगे- हजार-पाँच सौ में इन्हें बेच दिया जाता है। फिर पड़ियाँ रहेंगी तो गोबर निकलेगा ही, गोबर से वर्मी कम्पोस्ट खाद तैयार की जा सकती है। फिर प्रोफेसर साहब का पूरा व्याख्यान मेरे जेहन में घूमने लगा। गोबर से वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने की विधि, निःशुल्क प्रशिक्षण, निःशुल्क केंचुए की उपलब्धता, चार-पाँच सौ मासिक आमदनी इत्यादि-इत्यादि। फिर मैं सोचने लगी, चलो वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो भी गयी तो गाँव के लोग उसे बेचेंगे कहाँ, आमदनी तो तभी आयेगी जब खाद बिकेगी। इस पर मैं काफी सोची, परन्तु कोई समाधान नहीं निकल पाया। मैंने मन ही मन निश्चित किया कि मैं पाँच-दस पड़ियाँ खरीदकर उस स्कूल के अत्यन्त निर्धन, पर पढ़ने की इच्छाशक्ति वाले बच्चों को दे दूँगी। प्रोफेसर साहब से अनुरोध कर उनको प्रशिक्षित भी करा दिया जाएगा। इस तरह मेरा यह एक प्रयास बच्चों में स्वावलम्बन एवं उत्पादकता, दोनों का विकास करेगा। पड़िया से गोबर मिलना तुरन्त शुरू हो जाएगा एवं गोबर से वर्मी कम्पोस्ट तैयार होने लगेगी। साल-दो साल बाद पड़िया भैंस हो जाएगी जिससे दूध-दही भी प्राप्त होने लगेगा। अर्थात एक बच्चा यदि मेहनत से हमारी आकांक्षानुरूप अगर चलेगा तो उसे उच्च शिक्षा हेतु भी किसी का मोहताज नहीं रहना पड़ेगा। आखिर श्रीकान्त जी भी तो अधिकतम कक्षा आठ तक ही निःशुल्क शिक्षा दे पाएँगे। उसके बाद तो उन बच्चों का वही हाल होगा जो इस देश के लाखों-करोड़ों बच्चों का हो रहा है। इस कार्य से बच्चे हमारे देश की उत्पादकता का हिस्सा बन जायेंगे और अपनी शिक्षा-दीक्षा भी पूरी कर लेंगे और वो भी बिना किसी के एहसान के। कॉपी-किताब, डेªस या थोड़े पैसे से क्या होना? एक-आध मास बाद फिर वही किसी दानी का इन्तजार, इस तरह तो बच्चों में ताउम्र स्वाभिमान व स्वावलम्बन पैदा ही नहीं होने पाएगा। मैंने मन ही मन निश्चित कर लिया कि मैं अवश्य दस पड़िया खरीदकर एक प्रयास के रूप में उन बच्चों में बाँट दूँगी। शायद मेरा यह एक प्रयास कुछ बच्चों की जिन्दगी बदल दे। वैसे भी उनके पास खोने को तो कुछ नहीं है, परन्तु पाने के लिए बहुत कुछ बचा है। मैं यही सब सोच रही थी कि डोर बेल तेज-तेज बजने लगी। शायद मेरे शैतान बच्चे आ गए थे। मैं उठी और दरवाजा खोला, बच्चे आ गये थे। फिर मैं उनको खिलाने-पिलाने में व्यस्त हो गयी। बीच-बीच में वर्मी कम्पोस्ट कैसे बिकेगी वाली बात मेरे मन में खटक रही थी। शाम को पति महोदय ऑफिस से आए। संयोग से श्रीकान्त जी भी साथ ही थे। मैं चाय-नाश्ता बनाने लगी, वो लोग आपस में कुछ बात करने लगे। चाय भिजवाने के बाद मैं भी उन लोगों के साथ बैठ गयी और अपनी पूरी प्रयास की कल्पना और परेशानी बतायी। श्रीकान्त जी ने तुरन्त ही कहा- ‘इसमें कौन-सी समस्या है, मैं बच्चों से खाद स्वयं ही खरीद लूँगा और गोरखपुर के पौधशालाओं में उसे बेच दिया करूँगा।’ मैंने चैन की साँस ली, मेरी योजना अपना मूर्त रूप ले चुकी थी। मैं वहाँ से उठी और अपने कमरे से अपनी बचत का पाँच हजार रुपया लाकर श्रीकान्त जी को पकड़ा दिया और कहा- ‘यह लीजिए दस पड़ियों का दाम, बाकी का काम आप पूरा करें, हमें अपार खुशी होगी।’ मेरे पति ने चुटकी ली- ‘बहुत सौभाग्यशाली हो श्रीकान्त, आजतक इस बचत कोटे से लाख मनुहार के बाद भी कभी मुझे पैसे नहीं मिले, और तुमको इतनी खुशी के साथ पैसे मिल रहे हैं।’ मैं मन ही मन काफी प्रसन्न थी और शायद मेरे पति भी। मैं एक अनूठा प्रयास कर रही थी जिसमें किसी पर एहसान की बात नहीं है और यह प्रयास स्वावलम्बन और उत्पादकता दोनों को बढ़ावा देने वाला है। मैं अब मन ही मन योजना को मूर्त रूप लेने एवं सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगी। अब मैं लगातार अपने इस एक प्रयास की सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही हूँ और साथ में यह भी सोचती हूँ कि यदि सरकार कृषि उत्पादों के अतिरिक्त वर्मी कम्पोस्ट, शहद इत्यादि ग्राम आधारित उत्पादों का समर्थन मूल्य घोषित कर ब्लॉक संसाधन केन्द्रों के माध्यम से निरन्तर खरीददारी सुनिश्चित कर दे तो शायद इस देश में ‘मिड डे मील’ जैसी शर्मनाक एवं एहसान करने वाली योजनाओं की जरूरत न पड़े और बच्चों में स्वावलम्बन एवं उत्पादकता दोनों का विकास हो, जो भविष्य में हमारे देश की अर्थव्यवस्था के लिए अति उपयोगी साबित होगा। खाने के नाम पर पढ़ने के लिए बुलाना बड़ा चीप-सा लगता है और कुछ नहीं तो कम से कम बच्चों में लालची एवं अकर्मण्यता की प्रवृति तो पैदा करता ही है जो उनके साथ ताउम्र बना रहेगा। यह प्रवृति हमारे समाज, हमारे देश के लिए लम्बे समय में काफी घातक सिद्ध होगी।
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Posted On:  24/Dec/2016
Auther Name:  सुमन वी॰ आनन्द
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Article Title:  कुंठित पत्रकारिता

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Article Content:  हम हर रोज सुबह अखबार में हत्या, बलात्कार, डकैती, आत्महत्या, आशनाई प्रेमियों के घर से भागने की खबरें पढ़ते हैं। हममे से कुछ लोग इनको ध्यान से भी पढ़ते होंगे परन्तु ज्यादातर लोग सामान्य तौर पर ही पढ़ते हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि वर्तमान पत्रकारिता एक ही घटना को दो तरह से, क्यों लिखती है, सबल पक्ष के लिये अलग तरह से और निर्बल पक्ष के लिये अलग तरह से, उनका मन्तव्य या निहितार्थ क्या है? दरअसल ज्यादातर पत्रकार सबल वर्ग से हैं वे दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों एवं पिछड़ों से संबंधित ख़बरों को उनके नाम पता सहित छाप कर समाज में नंगा करते हैं जबकि अपने सबल वर्ग को बड़ी चतुराई से बचा ले जाते हैं। वे चाहते है कि अखबार के माध्यम से सब लोग यह जान जाए कि इसी निर्बल की लड़की घर भागी या इसके साथ बलात्कार हुआ और वह सेक्स की आदी भी पायी गयी। इसके बाद भी हर चैराहे हर गली के पान-चाय की दुकानों पर सबल वर्ग के लोग चटखारे ले लेकर उसी घटना की चर्चा रोज-रोज करते रहते हैं और अन्य लोगों को भी नमक मिर्च लगाकर एवं पत्रकारों से भी अधिक जायकेदार बना बनाकर सुनाते रहते हैं। जबकि सबल वर्ग के साथ हुई उसी तरह की घटना पर न तो चर्चा करते हैं और न ही करने देते हैं। सबसे शर्म की बात यह है कि सबल तो जो करना है करता ही है दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं पिछडे़वर्ग के लोग भी अपने भाई के साथ हुई दुर्घटना को छिपाने की बजाय और नमक मिर्च लगाकर और भी जायकेदार बनाकर चटखारे ले लेकर अपने मुँह का स्वाद बदलते हैं। इस मिथ्याभ्रम में कि ऐसी घटना उनके साथ थोडे़ होने वाली है अखबार के माध्यम से हिन्दुस्तान उनके मुँह पर थोडे़ थूकने वाला है और कसाई की दुकान पर बँधे बकरे की भाँति अपनी बारी आने का इन्तजार करते हैं कि जब पूरा हिन्दुस्तान की थूक उनके मुँह पर गिरेगी तब वह चिल्लायेगें या उसका विरोध करेंगे। अगर समाचार सारों का गौर से अध्ययन करे तो यह पायेंगे कि सवर्ण वर्ग अपने वर्ग की खबरे ऐसे लिखता है जिससे ज्यादातर लोग यही नहीं समझ पायें कि यह घटना किस परिवार के साथ घटित हुई है। अगर लिखता भी है तो ऐसे जैसे सवर्ण वर्ग की लड़की ने अपने घर से भागकर बेहयाई नहीं कि बल्कि उसने लैला, शीरी, जूलियट का कान काट दिया हो और प्रेम की दुनिया की नई तारीख हो गयी हो। अभी पूरे देश ने 6 महीने पहले वाराणसी की सवर्ण वर्ग की विरांगना प्रिया पाण्डे की बेहयाई की खबर, जिसमें वह बारात बैण्ड बाजा लेकर अपने प्रेमी के घर में जबरदस्ती घुसी थी, पढ़ी होगी| उसमें सारे पत्रकार भी शामिल थे पत्रकारों ने उसकी इज्जत को तारतार नहीं किया बल्कि उसको सामाजिक परिवर्तन की अगुआ के रूप में प्रस्तुत किया अर्थात यदि दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक या पिछडे़ की लड़की भागी तो वह कुल्टा है और उसका परिवार पतित एवं यदि सवर्ण वर्ग की लड़की भागती है तो वह अखबार नवीसों की नजर में प्रेम की दुनिया की नई हस्ताक्षर। जरा दिमाग पर जोर देकर सोचिये कि 2-3 साल पहले आपके शहर में ही जब एक पत्रकार की बहन एक अन्य वर्ग के लडके के साथ भागी थी तो क्या ऐसा नजारा आपको देखने को नहीं मिला था? जब निर्बल वर्ग को सवर्ण सताता है तो उसके पीछे यह पुच्छला कि वह सेक्स की आदी थी या पड़ोसियों को पता नहीं चला या घटना संदिग्ध है और जब सवर्ण वर्ग के साथ निर्बल वर्ग कोई प्रतिकार करता है तो वे गिद्ध की तरह नोचे वे अपराधी हैं, और जिसके साथ घटना हुई उसका नाम पता काल्पनिक परंतु घटना करने वालों को वास्तविक क्यों होता है दरअसल सवर्ण पत्रकार इस तरह का षडयंत्र इसलिये करते हैं कि पुलिस, समाज और न्यायपालिका भ्रमित हो जाये और जब सवर्णों के खिलाफ का मामला हो तो केस ही न दर्ज होने पाये और जब निर्बल वर्ग के खिलाफ मामला हो तो उस अखबार की कटिंग साक्ष्य के रूप में पेश की जा सके। जब किसी सवर्ण महिला के साथ बलात्कार या हत्या होती है तो सवर्ण पत्रकार इस तरह उस घटना को प्रस्तुत करता है जैसे उस युवती को गर्म सलाखों से दागा जा रहा हो, उसके बदन की चमड़ी उतार कर उस पर नमक रगड़ा जा रहा हो, वह सहायता के लिये चिल्ला रही हो, वह अत्याचारियों से अपनी इज्जत या जिन्दगी की भीख माँग रही हो लेकिन बलात्कारी भेड़ियो हो गये हो जो उसका माँस टुकड़े-टुकड़े कर नोच रहे हों। उनकों दया नहीं आ रही हो उसके चिल्लाते या चीखने पर वे अट्टाहास कर रहे हों। जबकि यही घटना जब दूसरे वर्ग की युवती के साथ होती है तो उस तरह प्रस्तुत किया जाता हो मानो वह कह रही हो बस तीन ही आये एक आध को और लाते, वह मुस्कराकर उनका स्वागत कर रही हो, वह कमर उठा-उठाकर आनन्द ले रही हो, वह चिल्ला चिल्ला कर उनको और उत्साहित कर रही हो। जब ये अखबार किसी दलित अल्पसंख्यक, या पिछडे़ वर्ग के बड़े व्यक्ति जैसे रामविलास पासवान, लालू यादव, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह, शिन्दे, बूटा सिंह, सलमान खुर्शीद, मायावती, काशीराम, प्रकाश अम्बेडकर, अटावले, स्व० मुरासोली मारन की खबर छापते हैं तो ऐसी ऐसी फोटो चुन चुन कर लगाते हैं जिसमें वह बंदर जैसे मुँह चिढ़ा रहे हों या खिसियानी बिल्ली जैसी भाव भंगिमा हो या तनावग्रस्त हो या पस्त हो या कोई स्फूर्ति ही न हो परन्तु जब ये सवर्ण की फोटो लगाते हैं तो उनकी उम्र से 15 साल पहले का हँसता मुस्कराता या गंभीर मुद्रा में विचार करते बड़ी समस्या का समाधान निकालने वाला आत्मविश्वास से भरा व्यक्तित्व प्रदर्शित करने वाला फोटो इत्यादि लगाते हैं जिससे समाज भ्रमित रहे कि निर्बल वर्ग में कोई भी न तो सम्मान का पात्र हैं और न ही योग्य हैं बल्कि वे तो घमण्डी, झगड़ालू, जोकर, बेईमान, जातिवादी, चरित्रहीन, बुद्धिविहीन हैं जबकि सवर्ण वर्ग का बड़ा नेता बुद्धिमान, सौम्य, विद्वान, दयावान, सक्षम और समर्थ इत्यादि इत्यादि हैं। आज इलैक्ट्रानिक मीडिया का युग है परन्तु क्या आपकी नजर में उपर्युक्त व्याधि से यह अछूता है ? यदि आपको ऐसा नहीं लगता तो टी.वी. खोलिये और एक प्रमुख समाचार चैनल का हिट कार्यक्रम गुस्ताखी माफ देखिये और जरा गौर फरमाइये कि आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक एवं पिछडे़ वर्ग के सम्मानित व्यक्तियों के मुखौटे कैसे कुंठित, कुटिल, बिल्ली जैसे झगड़ालू, बन्दर जैसे भावभंगिमा में, जोकर के रूप में थके हारे से, विद्वता से कोसों दूर रहने वाले जानवरों के रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जबकि सवर्ण वर्ग के मुखौटे की भव्यता, उनकी आवाज, उनकी सोच, उनकी विद्वता, उनकी शालीनता का विश्व पटल पर भी कोई विकल्प ही नहीं है। उनकी बात करने का अन्दाज अत्यन्त विद्वतापूर्ण एवं शालीन है और आवाज अत्यन्त प्रभावशाली। पत्रकारिता का नवीनतम कमाल देखिये कि देश का प्रधानमंत्री कश्मीरी ब्राह्मणों के घर पहुँच कर उनकी हाल देखता है यहाँ तक की एक समिति का भी गठन कर दिया गया। टी.वी. देखने पर यह साफ दिख रहा था कि उनके पक्के घरों में जरूरत के लगभग सभी सामान थे जैसे टी.वी., फ्रिज, पंखा, बाथरूम, बेड इत्यादि, पसंद के शायद नहीं होंगे। पर प्रश्न यह है कि क्या कोई संतरी भी आत्महत्या करने वाले बुनकर परिवारों, दलितों पतों के झोंपडो में निवास करने वाला आदिवासीयों, सड़क के किनारे एवं प्लेटफोर्म के आसपास प्लास्टिक की छत के नीचे रहनेवाले दलितों, पिछड़ों का हाल-चाल देखता है कि वे कौन सा पानी पीते हैं, इनका खाना कैसे बनता है, शौच कहाँ जाते है, वे क्या बिछाते हैं और क्या ओढते है उनके बच्चों को माँ के दूध के अलावा भी कोई खाना नसीब है कि नहीं? दरअसल इन बातों का न तो कोई संसद में उठाने वाला है और न ही कहीं कोई अखबार लिखने वाला है क्योंकि पत्रकारों ने दुख को भी जाति के आधार पर परिभाषित कर दिया है, जैसे सवर्णों का दर्द दर्द है और निर्बलों का दुःख-दर्द कूड़ा। आखिर कुछ विकल्प भी इस भँवर से निकलने का भी है कि नहीं ? मेरी समझ से दो विकल्प हैं प्रथम दलित अल्पसंख्यकों, पिछड़ों को एकजुट होकर एवं किसी एक अखबार या मीडिया को लक्ष्य करना चाहिये जो समाचार सम्पादन में निष्पक्षता नहीं करता हो, एवं उनका बहिष्कार एक साथ कर देना चाहिए। दूसरा यह कि हमें राष्ट्रीय स्तर पर अपना अखबार और चैनल बनाना होगा और यह कसम खानी होगी कि जब भी हम पढे़गे तो अपना अखबार जब भी देखेंगे तो अपना चैनल जो बिना किसी भेदभाव के हमारे साथ हुये अत्याचारों से हमें रूबरू करायेगा और राष्ट्रीय सामाजिक महत्वपूर्ण पहलुओं पर सार्थक बहस शुरू कर सकेगा।
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Posted On:  15/Oct/2016
Auther Name:  सुमन बी. आनन्द
Article ID: 
12
 
COMMENTS:
 
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on: 15/10/16
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